शून्य की प्यास
उस्ताद रेहान क़िदवई
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत
About
यह रचना तानपुरे की गूँजती हुई ड्रोन ध्वनि के साथ शुरू होती है, जिसमें तबले की जटिल लयबद्ध चक्र और राग आधारित मेलोडिक इम्प्रोवाइज़ेशन का समावेश है। मानवीय विरह और तड़प को दर्शाती यह प्रस्तुति शास्त्रीय गायन की गहराई और सूक्ष्म अलंकरणों को जीवंत करती है।
Lyrics
शून्य में खोजती मेरी आँखें,अधूरी सी एक प्यास लिए।साँसों की डोरी में पिरोई,अनकही रूह की आवाज़ें।तू कहाँ है, ओ मेरे मौला,ढूँढता हूँ तुझे हर जर्रे में।
धड़कन की लय में नाम तेरा,पल-पल बढ़ती ये बेचैनी।नैनों के दरिया में डूबी,तेरी यादों की ये परछाईं।बिन तेरे सूना है जहान सारा,जैसे बिन सावन की रुत कोई।
तू ही मंज़िल, तू ही रास्ता,भटक रहा हूँ मैं कब से यहाँ।आँखों की नमी में चेहरा तेरा,जैसे चाँद हो बादलों के दरमियाँ।तेरी खोज में ख़ुद को मिटा दिया,पर तू न मिला, न ही पता चला।
तड़प ये बढ़ती जाए,अधूरी प्यास बुझ न पाए।हर आह में तेरा ज़िक्र है,हर करवट में तेरी फ़िक्र है।कब तक ये दूरी रहेगी,कब तक ये रूह तरसेगी।
तेरे दर की आस लगा बैठा हूँ,तेरी याद में ख़ुद को भुला बैठा हूँ,तेरे ही नूर में समा बैठा हूँ।तेरे दर की आस लगा बैठा हूँ,तेरी याद में ख़ुद को भुला बैठा हूँ,तेरे ही नूर में समा बैठा हूँ।तेरे दर की आस लगा बैठा हूँ,तेरी याद में ख़ुद को भुला बैठा हूँ,तेरे ही नूर में समा बैठा हूँ।
शून्य की प्यास
उस्ताद रेहान क़िदवई
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