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Duration3:16

सत्य का पुराना दर्पण

पंडित शून्यदीप व्यास

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत

About

यह रचना एक गहन दार्शनिक यात्रा है, जिसमें तानपुरा के स्थिर ड्रोन के साथ तबले का जटिल लयबद्ध चक्र गुंथा हुआ है। राग आधारित मेलोडिक इम्प्रोवाइजेशन और हारमोनियम की मींड इसे एक आध्यात्मिक और शांत वातावरण प्रदान करती है।

Lyrics

alap

शून्य के विस्तार में, यह कैसी पहेली है?मैं कौन हूँ, कहाँ से आया, यह कैसी बेली है?साँसों की डोर में उलझा हुआ मन,ढूँढता है सत्य का कोई पुराना दर्पण।

jor

समय की रेत फिसलती है हाथों से,अस्तित्व का प्रश्न लड़ता है रातों से।क्या यह देह केवल मिट्टी का घड़ा है?या आत्मा का कोई गहरा पड़ाव खड़ा है?बाहर का शोर अब मौन हो चला है,अंदर का दीपक स्वयं ही जल चला है।

gat

परछाइयों के पीछे भागते हम,सत्य की खोज में जागते हम।माया के जाल में बंधा है संसार,फिर भी मन को है मुक्ति का आधार।न कोई अपना, न कोई पराया यहाँ,स्वयं को ही खोकर, स्वयं को ही पाया यहाँ।

jhala

अंधकार मिटा, ज्ञान का उदय हुआ,भ्रम का पर्दा अब तो विदा हुआ।जो बीज बोया था, वह वृक्ष बन गया,अधूरा सा जीवन, पूर्ण हो गया।मैं ही हूँ सागर, मैं ही हूँ धार,मैं ही हूँ पार, मैं ही हूँ आधार।

tihai

स्वयं को जान ले, स्वयं को मान ले,स्वयं को जान ले, स्वयं को मान ले,स्वयं को जान ले, स्वयं को मान ले।

सत्य का पुराना दर्पण

पंडित शून्यदीप व्यास

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