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Duration3:41

सावन फुहार का आलाप

पंडित श्रावण जोशी

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत

About

यह रचना तानपुरा की गूंज और तबला के जटिल ताल चक्र के साथ प्रकृति के बदलते मौसमों का एक शास्त्रीय चित्रण है। इसमें राग-आधारित स्वर-विस्तार और मींड का प्रयोग करते हुए सावन से फागुन तक की यात्रा को दर्शाया गया है।

Lyrics

सून के विस्तार में ये कैसी पहली है मैं कौन हूँ कहां से आया ये कैसी बेली है सासों की डोर में उलज़ा हुआ मन ढूड़ता है सत्य का कोई पुराना दरपन समय की रेत फिसलती है हातों से अस्तित्व का प्रश्न लड़ता है रातों से क्या ये देह केवल मिट्टी का घड़ा है या आटमा का कोई गहरा पड़ाव खड़ा है बाहर का शोड़ां मौन हो चला है अंदर का दीपक स्वयं ही जल चला है पढ़चायों के पिजे भागते हम जल चला है सत्य की खोज में जागते हम माया के जान में बंधा है संखिर भी मन को है मुक्ती का धान ना कोई अपना ना कोई पराया यहाँ स्वयं को ही खोकर स्वयं को ही पाया यहाँ ना कोई अपना ना कोई अपना स्वयं को ही पाया यहाँ अन्धकार मिटा जान का उदे हुआ धरम का परदाब तो विदा हुआ जो बीज बोया था वह विक्ष बन गया अधूरा सा जीवन पूर्ण हो गया मैं हूँ सागल्डा मैं ही हूँ धार मैं ही हूँ पार मैं ही हूँ आधार स्वयं को जान ले स्वयं को मान ले स्वयं को जान ले स्वयं को मान ले स्वयं को जान ले स्वयं को मान ले स्वयं को जान ले स्वयं को जान ले स्वयं को जान ले

सावन फुहार का आलाप

पंडित श्रावण जोशी

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