تیرے نام کا دیوانہ
استاد بشیر نصیر قادری
صوفیانہ قوالی
About
یہ قوالی ایک گہرے روحانی سفر کی عکاس ہے جس میں ہارمونیم کی مسلسل گونج اور طبلے کے تال کے ساتھ بتدریج رفتار میں اضافہ ہوتا ہے۔ آواز کا اتار چڑھاؤ اور صوفیانہ کلام، سامعین کو وجدانی کیفیت میں لے جانے کے لیے ڈیزائن کیا گیا ہے۔
Lyrics
इस अबाली में खेलने आर अपने त्रीप पर चड़ी हूँ विक्त फेकर इस अबर से तोड़ देगा तो ये पिंजल्रा क्या है साला हारूं तो कुछ भी नहीं तुझे घुट घुट के मरने का डर देखना जरा तुम ये वक्त कितना खास है और कितनी बड़ी वक्त की सोच तू ताकि तुझ को खा जाएगा बल ठक करेगा हजार बार फिर भी बस तू ऐसा रुके ऐसा हाँ नाया जजबे का यकीन जो तुझ पे आया और तुझ पे आएगा ऐसा ख्वागों में ताबी जो तेरी जो कमजोरी थी वो तेरी कीमती होगी तुझ से ना रहेगा ना ना वो तुझ से निच रहता तुझ से ना रहेगा ना ना वो तुझ से पेटा हसना चाहता है तो छुटना खबियत पे मरहम कभी होगा ना सो तु आखे खोल दुख देगा यहाँ गलती है तो पाने पे ही बवाल की याद रख तु सबसाह में फूलों की गटी का साल लगा दिखा ना छोड़ आके ताके ताके हम पे अब सपना इस जहाँ जहाँ जहाँ है दुनिया है वो दुनिया जहाँ तुछ से कट निकल जाए तुछ पे मर गाए तो तुछ पे गिरना आए मा के ये चीज अपने हाथों से कभी भी नहीं पा सकते मानों जिन्दा हो तो हाँ मारा तो कभी नहीं ओके ये बोले तो कभी भी नहीं तो से ना रहेगा ना ना अपो तुछ से नीचे रहता तो से ना रहेगा ना ना अपो तुछ से पे रहता हसना चाता है तो छुपना तो छुपना
تیرے نام کا دیوانہ
استاد بشیر نصیر قادری
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