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Duration2:58

درِ حضورِ شاہِ امم

سید زوار حسین چشتی

صوفیانہ قوالی

About

یہ قوالی ایک روایتی صوفیانہ تجربہ ہے جس کا آغاز ہارمونیم کے گہرے ڈرون اور طبلے کے تال کے ساتھ ہوتا ہے۔ اس میں بتدریج رفتار میں اضافہ اور پرجوش کال اینڈ ریسپانس تکنیک کا استعمال کیا گیا ہے جو روحانی کیفیت کو عروج پر لے جاتی ہے۔

Lyrics

या नवी नूर मजसं शाहे उम्मतिरे दर्कादा तीरे दर्कादा तीरी सूरत है आईन खाई दिगे जमाल की तीरी सिरत है तफसीर हर एक कमाल की तीरे कदमों की खौक से बने हिंगलस्तान जहान तही से तू रोशन है ये महफल कूनों मकान आगा तीरी रखमता के हम ही ताल गौर तीरे गौर तीरे जलू से रोशन है लेईलो नहारिया मस्तपिया मज्जदभी तजबे लाकों सलाम तीरे नाम से ही तू होता है हर कौम तमाल तीरी जूखट पे आकरे हर घम मुद्धर्द जाता है सूना मुख्दर्मी फल्मी सुनूर जाता मदीने दिलकाहे ताकान तीरे सेकनी मदीने दिलकाहे ताकान तीरे सेकनी मदीने दिलकाहे ताकान तीरे सेकनी हर भुल है गाना तीरे प्रियार मीद कूमटाना सरकार तीरी जूखट पे मीरा सर हो तीरी आदमी गुजटी हर सहर हो तीरी मुहबत का मजबह करम हो तीरी मुहबत का मजबह करम हो या नबी या नबी या नबी तीरे दर्बेही मीरी आखरी मन्सल है तीरे दर्बेही मीरी आखरी मन्सल है या रसूलिल्ले या हबीबल्ले

درِ حضورِ شاہِ امم

سید زوار حسین چشتی

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