अपनों के साए
सार्थक मेहरा
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About
यह गीत एक गहन सामाजिक ड्रामा है जिसमें तबला और ढोलक की पारंपरिक थाप के साथ भावुक स्ट्रिंग ऑर्केस्ट्रेशन का मेल है। राग-आधारित धुनों और परतदार स्वर-संगतियों का उपयोग करते हुए, यह ट्रैक घर के भीतर छिपे हुए तनाव और रिश्तों के ढोंग को खूबसूरती से चित्रित करता है।
Lyrics
दीवारों के साए में सिमटा है ये घरअपनों के ही बीच में है अनकहा सा डरखामोशियाँ चीखती हैं यहाँ हर पलरिश्तों की डोर उलझी है कल और आज में
मेज पर बिखरे हैं कुछ पुराने पुराने सवालचेहरों पे ओढ़े हैं सबने झूठे से जंजालकोई कहे हक़ मेरा, कोई कहे मेरी रज़ाइस भीड़ में खो गई है खुद की ही सज़ाआईने में झाँकूँ तो कोई अजनबी सा दिखेसच की तलाश में हर रास्ता क्यों बिखरे
अंदर का शोर बाहर की चुप्पी से बड़ा हैअपनों के बीच एक फासला खड़ा है
ये घर है या कोई उलझा हुआ किस्सासबने बाँट लिया है अपनों का हिस्सामुस्कुराहटों के पीछे छुपे हैं ज़ख्म गहरेरिश्तों के नाम पर बस ढोंग के पहरेइस भीड़ में अकेले हम कहाँ खो गएअपनों के ही साए में पराए हो गए
ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोते ढोते थक गएउम्मीदों के धागे हाथों में ही कट गएपरंपराओं की जंजीरें पैरों में भारी हैंअंदर से हम सब यहाँ आज़म-ए-लाचारी हैंबोलने को शब्द हैं पर ज़ुबाँ पे ताले हैंखुशियों के नाम पर बस गम ही पाले हैं
कभी तो ये पर्दा गिरेगा, कभी तो सच बोलेगाये समाज का तमाशा कब तक दिल को तोलेगापिंजरे की सलाखें तोड़ने का वक़्त आया हैसच को रूबरू करने का मंज़र छाया है
ये घर है या कोई उलझा हुआ किस्सासबने बाँट लिया है अपनों का हिस्सामुस्कुराहटों के पीछे छुपे हैं ज़ख्म गहरेरिश्तों के नाम पर बस ढोंग के पहरेइस भीड़ में अकेले हम कहाँ खो गएअपनों के ही साए में पराए हो गए
सब ढोंग मिटाकर फिर से जी लेंगेज़िंदगी का कड़वा घूँट पी लेंगेअब और नहीं ये मुखौटे पहनेंगेसच कहेंगे, सच जिएंगेबस सच कहेंगे।
अपनों के साए
सार्थक मेहरा
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