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Duration3:19

अपनों के साए

सार्थक मेहरा

Bollywood

About

यह गीत एक गहन सामाजिक ड्रामा है जिसमें तबला और ढोलक की पारंपरिक थाप के साथ भावुक स्ट्रिंग ऑर्केस्ट्रेशन का मेल है। राग-आधारित धुनों और परतदार स्वर-संगतियों का उपयोग करते हुए, यह ट्रैक घर के भीतर छिपे हुए तनाव और रिश्तों के ढोंग को खूबसूरती से चित्रित करता है।

Lyrics

intro

दीवारों के साए में सिमटा है ये घरअपनों के ही बीच में है अनकहा सा डरखामोशियाँ चीखती हैं यहाँ हर पलरिश्तों की डोर उलझी है कल और आज में

verse 1

मेज पर बिखरे हैं कुछ पुराने पुराने सवालचेहरों पे ओढ़े हैं सबने झूठे से जंजालकोई कहे हक़ मेरा, कोई कहे मेरी रज़ाइस भीड़ में खो गई है खुद की ही सज़ाआईने में झाँकूँ तो कोई अजनबी सा दिखेसच की तलाश में हर रास्ता क्यों बिखरे

pre-chorus

अंदर का शोर बाहर की चुप्पी से बड़ा हैअपनों के बीच एक फासला खड़ा है

chorus

ये घर है या कोई उलझा हुआ किस्सासबने बाँट लिया है अपनों का हिस्सामुस्कुराहटों के पीछे छुपे हैं ज़ख्म गहरेरिश्तों के नाम पर बस ढोंग के पहरेइस भीड़ में अकेले हम कहाँ खो गएअपनों के ही साए में पराए हो गए

verse 2

ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोते ढोते थक गएउम्मीदों के धागे हाथों में ही कट गएपरंपराओं की जंजीरें पैरों में भारी हैंअंदर से हम सब यहाँ आज़म-ए-लाचारी हैंबोलने को शब्द हैं पर ज़ुबाँ पे ताले हैंखुशियों के नाम पर बस गम ही पाले हैं

bridge

कभी तो ये पर्दा गिरेगा, कभी तो सच बोलेगाये समाज का तमाशा कब तक दिल को तोलेगापिंजरे की सलाखें तोड़ने का वक़्त आया हैसच को रूबरू करने का मंज़र छाया है

chorus

ये घर है या कोई उलझा हुआ किस्सासबने बाँट लिया है अपनों का हिस्सामुस्कुराहटों के पीछे छुपे हैं ज़ख्म गहरेरिश्तों के नाम पर बस ढोंग के पहरेइस भीड़ में अकेले हम कहाँ खो गएअपनों के ही साए में पराए हो गए

instrumental-break
outro

सब ढोंग मिटाकर फिर से जी लेंगेज़िंदगी का कड़वा घूँट पी लेंगेअब और नहीं ये मुखौटे पहनेंगेसच कहेंगे, सच जिएंगेबस सच कहेंगे।

अपनों के साए

सार्थक मेहरा

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