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Duration3:47

ہر دِشا جَیْکارُو

سید زاہد علی چشتی

صوفیانہ کلام

About

ایک روحانی صوفیانہ کلام جس میں ہارمونیم کے گہرے ڈرون اور طبلے کی روایتی تال کا حسین امتزاج ہے۔ گلوکار کی جذباتی اور پرسوز آواز، جو کہ melismatic انداز میں ہے، سامعین کو ایک وجدانی کیفیت میں لے جاتی ہے۔

Lyrics

अर्धू एकु दिश्रादा सृत्या पृष्णा जयिकारू पृष्णा जयिकारू अपर्थ्योगन शुस्तु कृष्णा जयिकारू पुन्हा कृष्णा जयिकारू कृष्णा जयिकारू जयिकारू जयिकारू अपर्थ्योगन शुस्तु कृष्णा जयिकारू जयिकारू पुन्हा कृष्णा जयिकारू कृष्णा जयिकारू जयिकारू सुन चुन कृष्णा जयिकारू विस्तार मन्धु जयिकारू सुम्पना इत्मा जयिकारू जयिकारू सम्पन्द जयिस्तु जयिकारू कृष्णा जयिस्तु जयिकारू पुन्हा जयिस्तु जयिकारू जयास्तु जयिस्तु सुन चुन कृष्णा जयिकारू विस्तार मन्धु जयिकारू सुम्पन्द इत्मा जयिकारू सम्पन्द जयिस्तु जयिकारू कृष्णा जयिस्तु जयिकारू पुन्हा जयिस्तु जयिकारू जयास्तु जयिस्तु सुन चुन कृष्णा जयिकारू विस्तार मन्धु जयिकारू सुम्पन्द जयिकारू सुम्पन्द जयिस्तु जयिकारू कृष्णा जयिस्तु जयिकारू पुन्हा जयिस्तु जयिकारू जयास्तु जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु कृष्णा जयिस्तु

ہر دِشا جَیْکارُو

سید زاہد علی چشتی

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