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Duration2:59

باطن کی تجلی

عاشق رضا قادری

صوفیانہ کلام

About

ایک گہرا صوفیانہ کلام جو ہارمونیم کے مسلسل ڈرون اور طبلہ کے روایتی تال چکروں پر مبنی ہے۔ اس میں جذباتی اور پر اثر آواز کے ساتھ میلزماتی ادائیگی کا استعمال کیا گیا ہے جو روحانی سکون اور باطنی پاکیزگی کی عکاسی کرتی ہے۔

Lyrics

पस्विल्नवाना भागतुम विनासिक। सच्यमानावा प्रेम की रचना। संजीविरसमे हुमे यडी सम्मा। प्रेम की रचना। असुचित नवरा प्रेम को इच्छत। प्रेम से जीव तुझे अम्लि नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम नमस्त। शित्रक्षित्र होया। प्रेम ऐसा हो जाहे द्रोपता। प्रेम के द्रोप को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम नमस्त। वधक्न वदा प्रेम को इच्छत। प्रेम से जीव तुझे अम्लि नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा। प्रेम नमस्त। प्रेम जलों को न यडी सम्मा।

باطن کی تجلی

عاشق رضا قادری

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باطن کی تجلی by عاشق رضا قادری | EchoLoRA: Generate a Song with AI