सच का आईना
धूल और धुन
भारतीय लोक संगीत
About
यह गीत एक मार्मिक सामाजिक टिप्पणी है जो पारंपरिक ढोलक और करताल की थाप पर आधारित है। इसमें बांसुरी की करुण धुन और गायक के मोडल स्वर लोक संगीत की कच्ची और प्रामाणिक बनावट को जीवंत करते हैं।
Lyrics
ओहो ओहो सुनो रे सयाने दुनिया की ये रीत पुरानी मिट्टी पूछे अपना हाल क्यों बढ़ली है अपनी जा महल खड़े है उंचे उंचे लोग यहाँ पर सोए हैं अपनों की ही गलियों में हम घुड़ को आज खोए हैं हात में जिसके सत्ता है वो सच को भी जूकाता है तरीब की सूखी रोटी पर अपना नाम लिखवाता है लदियां प्यासी घेतू डासी शोरी यहां बे बतलब का कौन सुनेगा पीर यहां पर इस माटी के मतलब का हो राही हो राही रुक जा जारा सच के आईमे में देख तेरा क्या है सवेरा अंधियारे में दीप जला कर कब तक हम बहलाएंगे छुड़के इन मुझे महलों को कब हम सच से ढाहाएंगे पानी में अब आग लगी है जमीर क्यों सुगया है इंसानियत का दामनिया देखो कैसे खो गया है कागज के इन सिक्कों में इमान अपना बेच दिया जो कल तक थे साथ हमारे आज वो पराए लगते हैं स्वार्थ की इस लंबी दोड में सब ही पौने लगते हैं मौन खड़ा जो खंबा है वो भी अब तो काम पता है कौन यहां पर सच बोलेगा हर कोई अब मपता है अन्धियारे में दीप जला कर कब तक हम बहलाएंगे छुड़के इन उचे महलों को कब हम सच से ठाएंगे पानी में अबाद लगी है जमीर क्यों सुगया है इंसानियत का दामनिया देखो कैसे खो गया है सब्सक्राइब करें समाय का पहिया गूम रहा है हिसाब सब ही होगा यहां मिट्टी बोलेगी अपनी भाषा गूंजेगा हर एक जहां जाग मुसाफिर जाग सवेरा अब तो आकें खोल जरा अपने ही हाथों से अपना लया एक कर दो बोल जरा हो रही हो रही जाग सरा सचकी रापर चल जरा चल जरा चल जरा चल जरा चल जरा
सच का आईना
धूल और धुन
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