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Duration3:02

साझा माटी का राग

सत्यम लोक दल

भारतीय लोक संगीत

About

यह गीत ढोलक और मंजीरे की थाप पर आधारित एक जीवंत लोक रचना है, जिसमें बांसुरी का मधुर सोलो और समूह द्वारा की गई तालबद्ध ताली वादन इसे और भी प्रभावशाली बनाता है। इसमें सामुदायिक एकता के भाव को शुद्ध पारंपरिक वाद्ययंत्रों और स्वाभाविक लोक गायन शैली के माध्यम से पिरोया गया है।

Lyrics

दुख तहारों मुख तहारों हाई दुख साहाई दुख आरों आरों आरों सूरज की खिरने जब आंगन में आती हैं सबके द्वारों पर एक सी मुस्कान लाती हैं पड़ोसी ने जीवन जीते जाते हैं हाथों में हाथों मन में विश्वास हो बुझने न पाए कभी ये जो एसास हो मिलकर हे तो राहें संवर्तिता की शक्ति दाडा की शक्ति सदा निखरती है मिलकर हे तो राहें संवर्तिता की शक्ति दाडा की शक्ति सदा निखरती है एकता का राग दाएं मिलकर हम सब आएं बैदभाव की दिवारों को आज हम सब ढाहाएं एकता का राग दाएं मिलकर हम सब आएं सुख दुख की इस साजी धारा में हम सब मिल बह जाएं मेहनत की बूंदे जब पसीने बिन कर बहती हैं तभी तो फसले खेकों में खुशहाली कहती हैं एकता का राग दाएं मिलकर हम सब आएं बैदभाव की दिवारों को आज हम सब ढाहाएं एकता का राग दाएं मिलकर हम सब आएं सुख दुख की इस साजी धारा में हम सब मिल बह जाएं ना उच्छ का बंधन ना बैर का कोई तेरा सब का है ये चमन और सब का है ये सवेरा बांट लो ये खुशिया मिटा दो सब तुरिया एक जोपर लिखेंगे कल की नई कहानिया एक ता का राग दाएं मिलकर हम सब आएं भेद भाव की दिवारों को आज हम सब ढाएं एक ता का राग दाएं मिलकर हम सब आएं सुख दुख की इस साजी धारा में हम सब मिल बह जाएं साजा है माटी साजा है दगण मिलकर सजाएं अपना ये चमना एक ता ही है अस्री पलिक ता ही हमारा कर

साझा माटी का राग

सत्यम लोक दल

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