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Duration3:33

अनहद का नाद

पंडित अनहतनाथ मिश्र

हिंदुस्तानी शास्त्रीय

About

यह रचना तानपुरा के गहरे ड्रोन और तबला के जटिल ताल चक्रों पर आधारित है, जो आध्यात्मिक जागृति की यात्रा को दर्शाती है। राग-आधारित मेलोडिक संरचना और गमक का सूक्ष्म प्रयोग इसे एक ध्यानपूर्ण और दिव्य अनुभव बनाता है।

Lyrics

शान्त मन गहिरा दूर मिटे नी सम्मन छेन मिटे नी सम्मन भीतर का ये कोणा जोट से है भर गया अंधियारा मन का अब तो सब सम्बर गया जोर जिसे बाहर वो तो भीतर ही था अनहत का ये नाड जो अंबर ही था सासों की डोरी में नाम तेरा पिरोया खो कर फुद को आज मैंने सब कुछ पाया तित तर दे ये दे मिट गाई ही माया धरम का ये नूर मुझ में ही समाया अमित सा ये रस रोम रोम में बहता परम सत्य को अब ये हुदय है कहता तहाई शयंबेला स्वयंबेला शान्त मंदहरा दूर मिटे नी सम्मन चेन मिटे नी सम्मन घेतर का ये ओना जोड़ा जोड़ से है भर गया अंधियारा मन का अब तो सब संभर गया तित तर दे ये दे मिट गाई ही माया धरम का ये नूर मुझ में ही समाया तित तर दे ये दे मिट गाई ही माया धरम का ये नूर मुझ में ही समाया तित तर दे ये दे मिट गाई ही माया धरम का ये नूर मुझ में ही समाया तित तर दे ये दे मिट गाई ही माया धरम का ये नूर मुझ में ही समाया

अनहद का नाद

पंडित अनहतनाथ मिश्र

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