आत्मबोध की खोज
विद्वान अनंत देव
हिंदुस्तानी शास्त्रीय
About
यह रचना तानपुरा के गहरे ड्रोन और तबले के जटिल ताल चक्रों पर आधारित एक दार्शनिक यात्रा है। इसमें राग की सूक्ष्म स्वर संरचना और मानवीय अस्तित्व के सत्य की खोज को स्वरबद्ध किया गया है, जो एक शांत और आत्म-चिंतनशील वातावरण बनाता है।
Lyrics
शून्य के इस पार मैं हूँशून्य के उस पार तुम होसाँस की डोरी उलझती है कहाँढूँढता मैं खुद को, मिटता मैं यहाँ
माया के जाल में फँसे ये नयनसत्य की खोज में भटके ये मनक्या है ये काया, क्या है ये प्राणमिट्टी का पुतला, अधूरा विधाननदी का जल जैसे बहता चलाअस्तित्व का दीप सा जलता चला
परछाईं मेरी मुझसे है दूरमैं ही हूँ प्यासा, मैं ही हूँ नूरकिसे पुकारूँ, किसे कहूँ मीतजीवन है एक अनकही सी प्रीतबीत गया जो, वो लौटता नहींजो है सामने, वो ठहरता नहीं
अंधियारे में खोई हुई राहेंखुली हैं फिर भी ये तन्हा बाहेंसमय की धारा में बहती है रीतहार में जीत है, जीत में हार हैसब कुछ यहाँ बस एक विस्तार हैमैं ही हूँ साखी, मैं ही हूँ गवाह
स्वयं को ही पाना है सत्य का सारस्वयं को ही पाना है सत्य का सारस्वयं को ही पाना है सत्य का सार
आत्मबोध की खोज
विद्वान अनंत देव
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