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Duration3:03

आत्मबोध की खोज

विद्वान अनंत देव

हिंदुस्तानी शास्त्रीय

About

यह रचना तानपुरा के गहरे ड्रोन और तबले के जटिल ताल चक्रों पर आधारित एक दार्शनिक यात्रा है। इसमें राग की सूक्ष्म स्वर संरचना और मानवीय अस्तित्व के सत्य की खोज को स्वरबद्ध किया गया है, जो एक शांत और आत्म-चिंतनशील वातावरण बनाता है।

Lyrics

alap

शून्य के इस पार मैं हूँशून्य के उस पार तुम होसाँस की डोरी उलझती है कहाँढूँढता मैं खुद को, मिटता मैं यहाँ

jor

माया के जाल में फँसे ये नयनसत्य की खोज में भटके ये मनक्या है ये काया, क्या है ये प्राणमिट्टी का पुतला, अधूरा विधाननदी का जल जैसे बहता चलाअस्तित्व का दीप सा जलता चला

gat

परछाईं मेरी मुझसे है दूरमैं ही हूँ प्यासा, मैं ही हूँ नूरकिसे पुकारूँ, किसे कहूँ मीतजीवन है एक अनकही सी प्रीतबीत गया जो, वो लौटता नहींजो है सामने, वो ठहरता नहीं

jhala

अंधियारे में खोई हुई राहेंखुली हैं फिर भी ये तन्हा बाहेंसमय की धारा में बहती है रीतहार में जीत है, जीत में हार हैसब कुछ यहाँ बस एक विस्तार हैमैं ही हूँ साखी, मैं ही हूँ गवाह

tihai

स्वयं को ही पाना है सत्य का सारस्वयं को ही पाना है सत्य का सारस्वयं को ही पाना है सत्य का सार

आत्मबोध की खोज

विद्वान अनंत देव

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आत्मबोध की खोज by विद्वान अनंत देव | EchoLoRA: Generate a Song with AI