आत्म-बोध का प्रश्न
पंडित आत्मदीप शर्मा
हिंदुस्तानी शास्त्रीय
About
यह रचना तानपुरा के निरंतर ड्रोन और तबले के सूक्ष्म ताल चक्रों पर आधारित एक दार्शनिक यात्रा है। इसमें राग की शुद्धता और मानवीय स्वर की कोमलता के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार के गहन प्रश्नों को उकेरा गया है।
Lyrics
अर्माँ खोत्यागा वो परवाँ आँखों पे कहते हैं परदा और हाथ हाथों पे गिरती हैं हाथ वो आके बोल दे मुझसे मैं भूलाना है राना जीता रहा मैं सबसे मैं जुड़ा सर्वोर मदूर से परणाम और हाथ हाथों पे गिरती हैं हाथ वो आके बोल दे मुझसे मैं भूलाना है राना अपना ने चेखा दिया बस्वाद मैंने ले का लिया पड़कुल की सौर्ख अपनी बस्वाग नी जगर ना ले गा लिया आँखों के पल में स्वान्दनिया ले के ना अपना सच सुन्ना ना ना चक कर स्वाद अपना सच ना तेरा सच अपना सच इनके दिल माना जाले है कर आँखों के पल में स्वाग नी जगर ना ले गा लिया आँखों के पल में स्वाग ना ले गा लिया
आत्म-बोध का प्रश्न
पंडित आत्मदीप शर्मा
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