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Duration3:42

आहो पार उतरो

पंडित दिव्यांशु वर्मा

Devotional

About

यह एक गहन आध्यात्मिक भजन है जो राग दरबारी की सूक्ष्मताओं पर आधारित है। इसमें तबले की पारंपरिक ताल और हारमोनियम की गूँज के साथ गायक की शांत और ध्यानमग्न आवाज़ अहंकार के विसर्जन का संदेश देती है।

Lyrics

उल्गहर तू चड़ो घर में जहां कौन भी तुम होते जहां गर यू लाश पाशे किन चुन्जरी रूप तो बाप भी रहेगा फलवेडी चकता नहीं अपलुटो बिनस्ट मुल आहो इश्के लोग नहीं खर्सू राग जगडे छुट आहो एमान करो आहो एमान करो आहो अंगरू आहो अपन सुपर्श का दिया कुछ इनको से कुछ ठाने दिया ये घर जाए यू दिल लगे रेडी वो ठले मोटी मुहे पाशे आहो पार जाए आहो पार जाए आहो बुडाज भी दिये अपन सुपर्श का दिया कुछ इनको धा किया ये चाहे आहो तू इंतर ना चाहे आहो प्यारा आज सुपर्श काने आहो अंबर की आहो पे चाहे आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज सुपर्श का आहो तू इंतर ना चाहे आज सुपर्श का आहो तू इंतर ना चाहे आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये

आहो पार उतरो

पंडित दिव्यांशु वर्मा

Preview

आहो पार उतरो by पंडित दिव्यांशु वर्मा | EchoLoRA: Generate a Song with AI