आहो पार उतरो
पंडित दिव्यांशु वर्मा
Devotional
About
यह एक गहन आध्यात्मिक भजन है जो राग दरबारी की सूक्ष्मताओं पर आधारित है। इसमें तबले की पारंपरिक ताल और हारमोनियम की गूँज के साथ गायक की शांत और ध्यानमग्न आवाज़ अहंकार के विसर्जन का संदेश देती है।
Lyrics
उल्गहर तू चड़ो घर में जहां कौन भी तुम होते जहां गर यू लाश पाशे किन चुन्जरी रूप तो बाप भी रहेगा फलवेडी चकता नहीं अपलुटो बिनस्ट मुल आहो इश्के लोग नहीं खर्सू राग जगडे छुट आहो एमान करो आहो एमान करो आहो अंगरू आहो अपन सुपर्श का दिया कुछ इनको से कुछ ठाने दिया ये घर जाए यू दिल लगे रेडी वो ठले मोटी मुहे पाशे आहो पार जाए आहो पार जाए आहो बुडाज भी दिये अपन सुपर्श का दिया कुछ इनको धा किया ये चाहे आहो तू इंतर ना चाहे आहो प्यारा आज सुपर्श काने आहो अंबर की आहो पे चाहे आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज सुपर्श का आहो तू इंतर ना चाहे आज सुपर्श का आहो तू इंतर ना चाहे आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये आज मोहे प्राण दिये
आहो पार उतरो
पंडित दिव्यांशु वर्मा
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