مٹی کا یہ کھلونا
سید ظہیر الدین قادری
صوفیانہ موسیقی
About
یہ کلام انسانی فانی زندگی کی حقیقت کو بیان کرتا ہے، جس میں ہارمونیم کا گہرا ڈرون اور طبلے کی تھاپ پر تالیوں کی گونج شامل ہے۔ صوفیانہ رنگ میں ڈوبی ہوئی یہ دھن melismatic vocal runs کے ساتھ روح کی پیاس اور فنا کی کیفیت کو اجاگر کرتی ہے۔
Lyrics
वहाँ आई मर जाना है बस नाम का परचाईन है तिरे हाथ में जुलक रिहिन ये वक्त का बैता पानी ही कब ही खश्क हो जाएंगी ये जिसे भूई परानी क्या हानी ही जिस महल को तो ने सजया तहा वो अभी रान सा लगता है ये सिंदगी तो एक मुसाफर है जो अब तक कर बीटता है ये जिसम तो मटी की मोरटत है मटी में ही मल जाएगी तिरी रूख की एपियस वो सब रब से ही मट जाएगी आओ बन्दे फिरा सफर मुख्तसर है ये दुनिया तू बस एक फुल का डर है या सब कचे आर दिरे सब कचे फानी है तिरी हस्ती तू बस एक पानी का बिल बिल है मट जाना है सबकू मट जाना है वो जो फुल तक साथ चलते है अब मजारू में सोए रिमजन के राम के जर चेते है अब वो मटी में यी तख्त बागी है बेखुई तज का रत बहेई है करज की खमूशी ही अब हर एंसन का मुक्दर है आये गाफल क्यूं गुरूर करता है अनचंद रूसे सुन सूं पर है वक्त की गंधिया डाल के तीरे सब खोबुं कुलम हुम में ओ बंदे तीरा सफर मुख्तसर है ये दुनिया तू बस एक बुल का कर है या सब कच आर भी है सब कच पानी है धीरी हस्ती तू बस एक पानी का बिल बिल है मट जाना है सबको मट जाना है खाली हाथ होयत है हम खाली हाथ ही जाना है असमटी के कर्स को मिनच काना है ना कोई साथा आएगा जाब स्थीरे हम डचाए ना जजतीरे मलका आएगा है फना के मसाफरे अब जगजा सब बखर जाएगा सब समझाएगा ये जहाँ है मुका सब बल जाएगा अब सुआही एक बाउगी रहगा जो अबद तक है खामूशी बस खामूशी मेरी आखरी मंजल है मट गिया में मट गिया में अस्वी समिट गिया
مٹی کا یہ کھلونا
سید ظہیر الدین قادری
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