पुरखों की गाथा
जागृति जोगी
Indian Folk
About
यह गीत पारंपरिक ढोलक और सारंगी की जुगलबंदी के साथ एक गहरी लोक धुन है, जो पुरानी पौराणिक कथाओं को जीवंत करती है। इसमें लयबद्ध गायन शैली और सूक्ष्म स्वर लहरियाँ मिट्टी की सोंधी महक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।
Lyrics
ओ मन्वातु जा जाग रे सांज ढले अब भाग रे प्रभु के भुके रे नाम बुकार मिट जाए सब अंधियारा माथे तिलक और हाथ में माला मन के भीतर प्रेम की जुबाला पल पल बीते आस न छोड़ी तेरी शरण में प्रीत है छोड़ी मिटडी के तन में जोती जगाई तू नहीं ही मुझे तो राह दिखाई प्रभु मेरे ओ मेरे स्वामी तू ही है अंतर्यामी चरणों में तेरे शिष्ण बाऊंगा कर तुझे मैं मन बहलाऊं तेरे सूरज डूबा चंदा आया तारागन ने सब कुछ पाया भोर की किरने तुझ से ही फूटी मंता की डोर कभी न तूटी कन कन में है तेरा ही देरा तू ही सवेरा तू ही अंधेरा हे प्रभु मेरे ओ मेरे स्वामी तू ही है अंतर्यामी चरणों में तेरे शिष्ण बाऊंगा कर तुझे मैं मन बहलाऊं तेरे साहारे ही अटकाना दुख के बादल जंट जाएंगे सुख के सावन फिर आएंगे विश्वास तेरा तुझ में ही अटका तू ही है माझी तू ही है अटका हे प्रभु मेरे ओ मेरे स्वामी तू ही है अंतर्यामी चरणों में तेरे शिष्ण बाऊंगा कर तुझे मैं मन बहलाऊं तेरे प्रभु में ही अटका तू ही है
पुरखों की गाथा
जागृति जोगी
Preview