सच के धागे
आलोक माटी
Indian Folk
About
यह गीत एक गहन सामाजिक टिप्पणी है जो एक मोडल मेलोडी और लयबद्ध मुखर वाक्यांशों के माध्यम से आधुनिक जीवन की विसंगतियों को उजागर करता है। इसमें ढोलक की पारंपरिक ताल और सारंगी के करुण स्वरों का उपयोग किया गया है, जो एक कच्चा और वास्तविक लोक अनुभव प्रदान करते हैं।
Lyrics
देख सरा तु राहों की ये धूलस्पनों के इस मेले में क्यों हो गया तू भूल पूची मिनारें खड़ी पर नीचे अंधियार है आग सिके इन सिकोनें सब कुछ ही तो मारा है हाथों में तो काम नहीं बातों में सब जनान है बदले बचेहरे यहाँ है जहरे यहाँ बिगटा हरमान है मिट्टी की वो खुशबू आबाओं में खो गई हो मुसाफिर हो रागीर जाग सरा तू जाग सच के आइने में देख क्या है तेरा दाग बदल रही है दुनिया सारी हम क्यों पीछे यह छूटे सचाई के धागे देखो कैसे है सब तूटे खेतों की वो पगड़ंगी अब शहर की भेड़ बनी चमक धमक के जाल में हर खुशी अब कैद चुनी रिष्टें अब तो फोन में बस एक नाम बन गए अपनों से ही दूर हम गुम नाम बन गए मेनत की वो रोटियां अब स्वाद नहीं दे तिन रोटियां अब स्वाद नहीं दे तिन दिखावे की ये दुनिया बजाद नहीं करती हो मुसाफिर ओ रागीर जाग जरा तू जाग सच के आइने में दे क्या है तेरा दाग बदल रही है दुनिया सारी हम क्यों पीछे इचे छुटे सच्चाई के धागे देखो कैसे है सब तूटे खेतों की वो पगडंगी अब शहर की भिर्ड बनी चमधमक के जाल में रोशनी कहां से आई सब की आगों पर पट्टी कानों में है शोर मंजिल का पता नहीं बस भाव रहे हर आजमीर की आवाज बारा तस्तूर है इसानियाद के नापर बस नपरत का ये नूर है ओ मुसाफिर ओ रागीर जाग जरा तू जाग सच के आइने में देख क्या है तेरा दाग बदल रही है दुनिया सारी हम क्यों पीछे इच्छे छुटे सचाई के धागे देखो कैसे है सब तूटे
सच के धागे
आलोक माटी
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