शून्य का साज़
पंडित शांतिसागर व्यास
भारतीय भक्ति संगीत
About
यह रचना राग आधारित सुरों और पारंपरिक तबला-हारमोनियम की जुगलबंदी से सजी है, जो मन की शांति को समर्पित है। इसमें गायन की शैली को एक मंदिर के शांत वातावरण के अनुरूप रखा गया है, जहाँ ध्वनि का हर स्पंदन आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है।
Lyrics
मन की लहरें शांत हुई हैंभीतर एक दीप जला हैसब कुछ मौन है सब कुछ शून्य है
बाहर की शोर भरी दुनियापल भर में ओझल हो गईजो उलझन थी मन के भीतरवो बूंद बनकर ढल गईन कोई आशा न कोई बंधनन कोई कल न आज हैसांसों की इस मद्धम गति मेंखुदा का ही साज़ है
भीतर के इस सागर में अब लहरें नहीं उठती हैंआत्मा की इस गहराई मेंसब उलझनें सिमटती हैंशांति का ये अमृत कण-कणमेरे तन में घुलता हैबंद थे जो द्वार हृदय केअब वो दर खुलता है
न कोई पाने की हसरत हैन कोई खोने का डर हैजो भी था वो सब यहीं हैये कैसा सुंदर सफर हैआंखें मूंदूं तो दिखता हैएक नूर का फैला नूरदुनिया की इस भाग-दौड़ सेमैं हो गया कितना दूर
भीतर के इस सागर में अब लहरें नहीं उठती हैंआत्मा की इस गहराई मेंसब उलझनें सिमटती हैंशांति का ये अमृत कण-कणमेरे तन में घुलता हैबंद थे जो द्वार हृदय केअब वो दर खुलता है
तृप्ति का ये भाव अनोखारोम-रोम में छा गयामेरा मैं ही मुझमें खोकरमुझको ही फिर पा गयाअनंत की इस गोद में सोयामन अब जाग उठा हैप्रेम का ये शीतल झरनाभीतर ही उमड़ उठा है
सब कुछ शांत हैसब कुछ मौन हैमैं ही मैं हूंऔर ये मन भी मौन हैशांति ही सत्य हैशांति ही मुक्ति है
शून्य का साज़
पंडित शांतिसागर व्यास
Preview