मेट्रो का सफ़र
ख्वाहिश खन्ना
इंडि-पॉप
About
एक आधुनिक इंडि-पॉप ट्रैक जिसमें सिंथेसाइज़र की चमकदार लेयर्स और पारंपरिक तबले की थाप का बेहतरीन मिश्रण है। यह गाना शहरी जीवन की भागदौड़ और अकेलेपन की भावनाओं को एक मधुर और रेडियो-फ्रेंडली धुन में पिरोता है।
Lyrics
बातों साधिता दुन्धला साधापनीसा एसेरुपजंभीसा धायकनकहामोडेकनयासविराकुतकुढुन्धनिका ये खेल गहरा आईने में चंका तो छेहरा मिलाकर वो मुस्कान कही खोई होई थी भीड में चलते चलते आधामन्धेरी अपनी धड़कनी सोई होई थी गिताबों के पन्नों पढ़ा धूरे आक्यों में अर ढोड़ता रा हवाओने दस्तक दी दरवाजा खुला जो था अंदर चिपा वो रंग अप मिला मैं खुद से मिल रहा हूँ आज पहली बारे मेरी अपनी दुनिया ये मेरा अपना प्यार ना कोई बन्धन ना कोई अब सवाल मैं अपनी ही धुन में बे फिक्र बे हाल खुद को पाना ही त पुराने रास्तों को पीछे चोड़ा या जो खाब तूटे थे उन्हें फिर से जोड़ा दूसरों की नजरों का बोज्धा भारी अब अपना ही सफर है अपनी सवारी बल्कियों में छिपी थी मेरी पहचाना अब समझाया म्या है ये जहान मैं खुद से मिल रहा हूँ आज परी बाले मेरी अपनी दुनिया ये मेरा अपना प्यार ना कोई बन्धन ना कोई अब सवाल मैं अपनी धुन में बे फिक्र बे हाल खुद को पाना ही त सबसे बड़ी जीत है धुप में खिली कलिया बारिश की भुंदें खुली है अब मेरी ये आखें जो थी मुण्डें जो भी हूँ मैं जैसा भी हूँ हकीकत हूँ मैं अपनी ये सवारी गल्तियों में छिपी थी मेरी पहचाना समझाया मुझे क्या है ये जहान मैं खुद से मिल रहा हूँ आज पहली बारे मेरी अपनी दुनिया ये मेरा अपना प्यार ना कोई बन्धन ना कोई अफ सवाल मैं अपनी ही धुन में बे पिक्र बे हाल खुद को पाना ही त सबसे बड़ी जीत है इसे पना शाम से उत्ता बदले है मैं मान जड़ का जड़ारे देखूँ
मेट्रो का सफ़र
ख्वाहिश खन्ना
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