महानगर की पहेलियाँ
सफरनामा कलेक्टिव
इंडि-पॉप
About
एक आधुनिक इंडि-पॉप ट्रैक जिसमें सिंथेसाइज़र की चमक और तबले की पारंपरिक थाप का अनूठा मेल है। यह गीत शहरी जीवन की भागदौड़ और आत्म-खोज के बीच के संतुलन को एक मधुर और लयबद्ध धुन में पिरोता है।
Lyrics
हावाओं में घुला है इस शहर का शोर भागती हुई ये गल्या मैं चलती हुई डूर सबनी ढून में सब अपने निशान हम खोए हुए है कहा से कहा काँच की खिड़ती से बाहर चांकती सब भागती की खुश्पू में बट रूटी जिन्द की गड़ी डेली की सुई पर्टी की है ये बंद की पुराने ख़तों में दबी है कोई बात आज फिर याद आए वो ढलती हुई रात भीर मैं भी तना खड़ा ये मन सपनों के बीचे दोड़ता है ये तना खोमें करणा काजल और चेहर पे धुले ये शहर अपना है फिर भी है भूलो ये शहर है अपना ये रफतार अपनी आंकों से देखी हुई ये स्वपनिल कहानी कभी धूप देखी कभी चाम थंडी बले में जाज जैसे मौसम की मंडी जीना है हमको इसी शोर के तरमा ढूंडनी है खुद की ही अपनी अपनी ही जुबा तफतर की मेच बर बिखरी हुई फाइलों में जिन्दगी सिम्मट आई है ने चोटी सी मीलोन में लिफ्ट का और लिफ्ट में चुपी जैसे सबने पेंदे तो रुशनी का सेलाब है अंधेर भी चमकता हुआ ये ख़वाब है ये शहर है अपना ये रफतार अपनी आँखों से देखी हुई ये स्वपनिल कहानी कभी दूपती की कभी चाम धंडी बदले में जाज जैसे मौसम की मंडी जीना है हमको इसी शोर के दर्बा ढूंढनी है खुद की ही अपनी अपनी जुबां कभी रुखना भी अच्छा लगता है कहीं जब सब कुछ थम जाए और कुछ भी नहीं सिर सासों की आर तौर तारों का नूरस भाग दोर से थोड़ा सा दूर फिर वही दौड़ वही रास्ता होगा लेकिन आज का ये लमहा अपना ही होगा ये शहर है अपना ये रफतार अपनी आंखों से देखी हुई ये स्वपनिल कहानी कभी दूपत दिखी कभी चाँ धंडी बदले मिजाज जैसे मौसम की मंडी जीना है हमको इसी शोर के दर्मा ढूंदनी है खुद की अपनी अपनी जुबाँ शहर सोता नहीं
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