मुझमें ही तू
पंडित नूरज्योति मिश्र
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा के स्थिर ड्रोन-लेयर के साथ शुरू होकर तबला की लयबद्ध ताल और सितार की सूक्ष्म राग-सुधार में विकसित होती है। इसमें आध्यात्मिकता और भक्ति का गहरा समावेश है, जो श्रोता को ध्यान की अवस्था में ले जाता है।
Lyrics
ओ३म्, मनवा तू क्यों भटके अनजाने पथ परजहाँ कोई नहीं, बस सन्नाटा है भीतरखोया हुआ है तू माया की इन गलियों मेंढूंढ उसे, जो बसा है तेरी ही धड़कन में
नयन मूंद कर देख ज़रा, नूर का ये कैसा बसेराबिन दीपक के जल रही है ज्योत, मिट रहा है अंधेरासांसों की माला पे नाम तेरा ही पिरोया है मैंनेमुझमें ही तू है, ये राज़ अब जान लिया है मैंने
तेरी चौखट पे सर झुकाए, मैं तो कब से बैठा हूँतेरी रहमत की बूँदें पाने को, मैं तो प्यासा बैठा हूँन कोई मंदिर, न कोई मस्जिद, न कोई बंधन भारीतेरी भक्ति ही मेरी मुक्ति, तू ही है मेरी दुनिया सारीसाँस साँस में बस तू ही बसता, तू ही मेरी रूह का सवेरातेरी चौखट पे सर झुकाए, मैं तो कब से बैठा हूँ
तू ही आदि, तू ही अंत, तू ही पूर्ण विश्वास हैतेरे चरणों की धूल में, मेरी पूरी कायनात हैमिट जाए ये 'मैं', बस तू ही तू रह जाएतेरी रज़ा में ही अब, ये जीवन कट जाएतू ही तू, बस तू ही तू, रोम रोम में तू ही तू
तुझमें खोया, तुझमें पाया, तुझसे ही सब हैतुझमें खोया, तुझमें पाया, तुझसे ही सब हैतुझमें खोया, तुझमें पाया, तुझसे ही सब है
मुझमें ही तू
पंडित नूरज्योति मिश्र
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