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Duration3:49

मुक्ति का सोपान

पंडित निर्बंधु मिश्रा

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा की गूंजती ड्रोन-लेयर के साथ शुरू होती है, जिसमें बांसुरी की मधुर राग-इम्प्रोवाइज़ेशन धीरे-धीरे विकसित होती है। तबला की लयबद्ध ताल धीरे-धीरे गति पकड़ती है, जो एक आध्यात्मिक और ध्यानमग्न वातावरण का निर्माण करती है।

Lyrics

alap

शून्य के उस पार देख, मन का पंछी उड़ चलाबंधन सारे तोड़कर, ज्योति में जो मिल गयान कोई सीमा, न कोई बंधन, न कोई नाम का भारअनंत की इस गोद में, खो गया संसार

jor

देह की इस कैद से, रूह मेरी मुक्त हैमिट गए सब फासले, अब तो सब युक्त हैजो कल तक था उलझा हुआ, धागों के जंजाल मेंआज वो डूबा हुआ, अमृत के उस ताल में

gat

मिट गई पहचान मेरी, मिट गई ये प्यास हैसांसों की इस डोर में, प्रभु का ही वास हैमैं न हूँ, तू ही तू, हर एक कण में व्याप्त हैमुक्ति का ये मार्ग ही, सबसे बड़ा साक्षात है

tihai

बंधन खुले, मन खिल गयाबंधन खुले, मन खिल गयाबंधन खुले, मन खिल गया

jhala

अंधियारे सब छंट गए, प्रकाश ही प्रकाश हैमिट गई ये देह भी, ये कैसा सुहास हैपूर्ण हुआ है सफर, मिल गई है मुक्ति अबस्वयं में ही लीन हूँ, शांत है ये चित्त अबस्वयं में ही लीन हूँ, शांत है ये चित्त अब

मुक्ति का सोपान

पंडित निर्बंधु मिश्रा

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