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Duration3:39

आत्म-मुक्ति का राग

उस्ताद सत्यज्योति खान

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा के गहरे ड्रोन-लेयर पर आधारित है, जिसमें तबला की तालबद्ध लय और सितार की सूक्ष्म राग-इम्प्रोवाइजेशन का अद्भुत संगम है। यह आध्यात्मिक मुक्ति की यात्रा को दर्शाती है, जहाँ प्राकृतिक ध्वनियाँ और शास्त्रीय वाद्ययंत्र मिलकर एक शांत और ध्यानमग्न वातावरण बनाते हैं।

Lyrics

alap

शून्य में खोया है मन का कोनाजैसे भोर में ओस का होनान कोई बंधन, न कोई मायास्वयं में ही स्वयं को पायाअंधियारे का अंत हुआ अबज्योति का संगम हुआ तब

jor

बहे हवा जैसे सासों की डोरखोज रही है एक नया छोरमाया का यह जाल पुरानामिट गया आज सब आना-जानारंग सारे फीके पड़ गएसत्य के द्वारे हम बढ़ गए

gat

मुक्त हुआ यह प्राण का पंछीछोड़ के पिंजरा, छोड़ के संजीअमिट है प्यास, मिट गई तृष्णामिल गई प्रभु की पावन कृष्णान कोई दूरी, न कोई अंतरबस एक प्रकाश हृदय के भीतर

jhala

जगे हैं सोए हुए सब भागमिट गए मन के सारे रागदौड़ती दुनिया रुक गई आजमिल गया हमको आत्म का राजशांत है नदियाँ, शांत है धाराडूबा है मन में सत्य का तारा

tihai

बंधन टूटे, मुक्त हुआ मनबंधन टूटे, मुक्त हुआ मनबंधन टूटे, मुक्त हुआ मन

आत्म-मुक्ति का राग

उस्ताद सत्यज्योति खान

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आत्म-मुक्ति का राग by उस्ताद सत्यज्योति खान | EchoLoRA: Generate a Song with AI