अस्तित्व का राग
पंडित शून्य प्रकाश
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना एक गहरे दार्शनिक चिंतन पर आधारित है, जहाँ तानपुरा का ड्रोन-लेयर एक स्थिर आधार प्रदान करता है। तबला की लयबद्ध ताल और राग की सूक्ष्म हरकतों के साथ, यह संगीत आत्म-खोज की यात्रा को स्वरबद्ध करता है।
Lyrics
शून्य के इस पार मैं, उस पार तुमअस्तित्व की है खोज में, खोए हुए हमये देह क्या है, ये प्राण क्या हैबुझती हुई एक लौ का, ये मान क्या है
नदी की धारा में, खुद को ढूँढता हूँकिनारे छूटते हैं, पर मैं रुकता हूँक्या सत्य है, क्या भ्रम का जालउलझा हुआ है, मन का हर सवाल
मिट्टी से उपजा, मिट्टी में मिल जानाफिर क्यों है ये दुनिया को, अपना बनानासाँसों की डोरी, एक राग गाती हैसच्चाई की राह, धुंधली सी भाती हैन मैं हूँ कोई, न मेरा कुछ यहाँबस एक प्रकाश, जो है बेनिशां
भीतर की गहराई, खुद ही नापनी हैअधूरी सी कहानी, खुद ही छापनी हैन कोई बंधन, न कोई यहाँ कैदसमय की गति में, मिटती हर एक भेदजागती आँखों से, देखूँ मैं सपनाकौन है पराया, और कौन है अपना
सत्य की खोज में, मैं मिट रहा हूँसत्य की खोज में, मैं मिट रहा हूँसत्य की खोज में, मैं मिट रहा हूँ
अस्तित्व का राग
पंडित शून्य प्रकाश
Preview