काल की अनंत धारा
उस्ताद समीर खान
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा की गूंजती ड्रोन-लेयर के साथ शुरू होती है, जिसमें समय के बीतने का मार्मिक चित्रण है। तबला-परकशन का तालबद्ध विकास और राग आधारित मधुर सुधार धीरे-धीरे एक आध्यात्मिक गहराई तक ले जाते हैं।
Lyrics
शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी कुछ पहुचे मजदाया बन्दू शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी कुछ पहुचे मेरी माँ बाबा हूँ तुमसे परिशे कुछ पहुचे मेरी सारी जवानी आंधिया से मुख परिशंग का अनोंगे अपनी जान्मानों से मत दिखाओ से शिव तो प्रसादी बुइरा करिंगे शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी शिव तेरे पन्ता भी स्वस्वमी
काल की अनंत धारा
उस्ताद समीर खान
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