शून्य की पहेली
पंडित रहस्यनाथ मिश्र
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा के गहरे ड्रोन-लेयर पर आधारित है, जिसमें सितार की मेलोडिक-राग-इम्प्रोवाइज़ेशन और तबला-परकशन का सूक्ष्म तालमेल है। गीत का दार्शनिक भाव एक शांत और ध्यानमग्न वातावरण बनाता है, जो शास्त्रीय परंपरा की शुद्धता को दर्शाता है।
Lyrics
शून्य की इस गोद मेंमैं कौन हूँ, ये क्या पतासाँस की डोरी में उलझाढूँढता हूँ अपनी रज़ा
अंधियारे मन के कोने मेंएक दीया जलता सा दिखेबाहर जो शोर है दुनिया काभीतर क्यों मौन सा लिखेमैं स्वयं ही हूँ एक पहेलीखुद में ही खोया हुआ मुसाफिर
पानी की बूँद सागर में जाकरक्या फिर बूँद रह जाती हैमिट्टी का ये पुतला आखिरकिस मिट्टी में मिल जाती हैजीवन का ये खेल अनोखापल में आए, पल में जाएन कोई अपना, न कोई परायामाया का जाल बिछाए
जवाब नहीं, बस प्रश्न ही शेष हैमृगतृष्णा सा ये संसार हैजो दिख रहा, वो सत्य नहींसत्य तो बस एक विचार हैमैं हूँ, मैं नहीं, बस शून्य हैचेतना की गहरी लहरों मेंबहता चला, बहता चला
मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँमैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँमैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ
शून्य की पहेली
पंडित रहस्यनाथ मिश्र
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