Skip to content
शून्य की पहेली
Duration3:16

शून्य की पहेली

पंडित रहस्यनाथ मिश्र

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा के गहरे ड्रोन-लेयर पर आधारित है, जिसमें सितार की मेलोडिक-राग-इम्प्रोवाइज़ेशन और तबला-परकशन का सूक्ष्म तालमेल है। गीत का दार्शनिक भाव एक शांत और ध्यानमग्न वातावरण बनाता है, जो शास्त्रीय परंपरा की शुद्धता को दर्शाता है।

Lyrics

alap

शून्य की इस गोद मेंमैं कौन हूँ, ये क्या पतासाँस की डोरी में उलझाढूँढता हूँ अपनी रज़ा

jor

अंधियारे मन के कोने मेंएक दीया जलता सा दिखेबाहर जो शोर है दुनिया काभीतर क्यों मौन सा लिखेमैं स्वयं ही हूँ एक पहेलीखुद में ही खोया हुआ मुसाफिर

gat

पानी की बूँद सागर में जाकरक्या फिर बूँद रह जाती हैमिट्टी का ये पुतला आखिरकिस मिट्टी में मिल जाती हैजीवन का ये खेल अनोखापल में आए, पल में जाएन कोई अपना, न कोई परायामाया का जाल बिछाए

jhala

जवाब नहीं, बस प्रश्न ही शेष हैमृगतृष्णा सा ये संसार हैजो दिख रहा, वो सत्य नहींसत्य तो बस एक विचार हैमैं हूँ, मैं नहीं, बस शून्य हैचेतना की गहरी लहरों मेंबहता चला, बहता चला

tihai

मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँमैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँमैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ

शून्य की पहेली

पंडित रहस्यनाथ मिश्र

Preview