मुक्ति का द्वार
पंडित सावन मिश्र
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा के गहन ड्रोन-लेयर और तबला की सूक्ष्म तालबद्ध लय पर आधारित है। इसमें राग-आधारित माधुर्य का विस्तार है, जहाँ सितार की मींड और गमक के साथ आध्यात्मिक मुक्ति का भाव व्यक्त किया गया है।
Lyrics
सांसों की डोर से बंधा ये मनढूंढे किनारा, ढूंढें गगनमाया की छाया में खोई है कायाकैसी ये उलझन, कैसी ये मायामिट जाए दूरी, मिट जाए भेदआत्मा पुकारे, मिटे सब खेद
बंदन खुले अब, पंछी उड़ा हैअंबर की ऊंचाइयों से ये जुड़ा हैना कोई बंधन, ना कोई बंधनभीतर बसे हैं प्रभु के ही दर्शनअंधियारे पथ से निकल आया बाहरमिला है किनारा, मिला है सावन
मुक्ति की राह है कितनी सुहानीबहती है भीतर अमृत की पानीजो था पराया, वो अपना हुआ हैशून्य में सारा जग ही समाया हैना मैं रहा, ना तू रहासिर्फ प्रेम का सागर ही बहता रहा
जाग उठी है सोई हुई ज्योतिमिट गई मन की पुरानी सी मोतीहंस उठी आत्मा, खिल उठा मनपा लिया प्रभु को, पा लिया जीवनअब ना कोई प्यास, ना कोई आसप्रभु के चरणों में है निवास
मुक्ति का द्वार खुल गया है आजमुक्ति का द्वार खुल गया है आजमुक्ति का द्वार खुल गया है आज
मुक्ति का द्वार
पंडित सावन मिश्र
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