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Duration7:42

शून्य का बसेरा

पंडित निर्वाण मिश्र

शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीत

About

यह रचना तानपुरा की गूंज और तबले के जटिल ताल चक्र के साथ एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है। राग आधारित मेलोडिक संरचना और सूक्ष्म अलंकरणों के माध्यम से यह संगीत सुनने वाले को एक शांत और ध्यानमग्न अवस्था में ले जाता है।

Lyrics

alap

साँसें थमी हैं शून्यता के द्वार परजैसे कोई प्यासा खड़ा हो सागर के पार परन कोई रस्ता, न कोई मंज़िल का निशानबस एक अनकहा सा मौन, और मेरा अंतर्ध्यान

jor

धड़कन की लय में ढलने लगी है ये रातसमय की रेत फिसलती है हाथों से, क्या है बात?बीत गया जो कल, वो अब एक धुंधला सा साया हैजिसने मुझे इस पल की गहराई में बिठाया हैठहरा हुआ है वक्त, जैसे कोई ठहरा हुआ ख़्वाबखोज रहा है मन, अपने ही सवालों का जवाब

gat

सा रे गा मा, सुरों की ये डोर थामे हुएहम तो चले हैं खुद को ही खुद में पाने हुएतालों के घेरे में सिमटती है ये कायनातहर एक मात्रा में बसी है कोई अनकही बातन कोई शोर है, न कोई अब उलझन का घेराबस एक मैं हूँ, और मेरा ये रूहानी डेरा

jhala

तेज़ होती है अब ये रफ़्तार, जैसे गिरता हुआ झरनामिट रहा है हर एक बंधन, अब नहीं है कुछ भी करनाबिखरे हुए तारे जैसे आसमान की चादर मेंखो गया हूँ मैं अब तो, प्रेम की इस पावन गागर मेंसब कुछ लयबद्ध है, सब कुछ है एक लय में समायाजो भी पाया था मैंने, आज वो सब कुछ है गंवायापूर्ण हुआ ये सफर, अब तो बस शून्य का ही बसेरामिट गया है मुझसे, मेरा ही ये छोटा सा घेरा

शून्य का बसेरा

पंडित निर्वाण मिश्र

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शून्य का बसेरा by पंडित निर्वाण मिश्र | EchoLoRA: Generate a Song with AI