शून्य का स्पंदन
पंडित समीर मिश्रा
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा की स्थिर गूंज और सितार के सूक्ष्म अलंकारों के साथ एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है। इसमें राग आधारित मेलोडिक संरचना और ताल के चक्र का अद्भुत तालमेल है, जो श्रोता को ध्यान की अवस्था में ले जाता है।
Lyrics
साँसों की डोरी में, अटका है मन मेराशून्य की गोद में, ढूँढूँ मैं घर तेराबिन बोले जो कहे, वो मौन भाषा हैतृषा में डूबी हुई, ये रूह की आशा है
पल-पल बीतती है, ये उमर की लकीरेंमिटती और बनती हैं, यादों की ये तस्वीरेंसूरज की पहली किरण, माथे को छूती हैजैसे मेरी आत्मा, तुझसे ही जुड़ती है
खोई हुई राहों में, तू ही किनारा हैबहते हुए दरिया का, तू ही सहारा हैधड़कन की लय में, तेरा ही नाम हैतू ही है मंज़िल, और तू ही मुकाम है
तार-तार झंकृत, ये वजूद मेरातुझमें ही ओझल, ये वजूद मेरामिट गया फासला, अब कोई दूरी नहींतू ही है रूबरू, अब कोई मजबूरी नहींतू ही है रूबरू, अब कोई मजबूरी नहीं
शून्य का स्पंदन
पंडित समीर मिश्रा
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