अनंत का स्पंदन
विहान राग-नंदन
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा के निरंतर गूँजते ड्रोन और सितार की सूक्ष्म सूक्ष्मस्वर अलंकारों के साथ शुरू होती है। इसमें राग आधारित माधुर्य और तबले की जटिल ताल का सुंदर समन्वय है, जो श्रोता को एक गहन आध्यात्मिक शांति की ओर ले जाता है।
Lyrics
शून्य में गूँजती है एक गहरी पुकारसाँसों की डोर में उलझा है संसारनभ का कोना-कोना मौन है पड़ामैं यहाँ, तू वहाँ, बीच में समय खड़ा
पलकें झुकीं तो यादें उभर आईंबीते हुए कल की धुंधली परछाईंहृदय के स्पंदन में तेरा ही नाम हैतू ही तो मेरी सुबह, तू ही मेरी शाम हैबुझती हुई लौ में भी जलती रही आसतेरे होने का एहसास ही है मेरे पास
सावन की बूँदें, आँगन की माटीबीते पलों की यादें हैं बाँटीमृगतृष्णा सा ये जीवन का मेलाहर मोड़ पर खड़ा मन हुआ अकेलापर तू है साथ, जैसे रगों में बहता लहूतेरी ही धुन में मैं खुद को हूँ ढूँढता रहूँ
आकुल मन का हर तार झनझनायाखोया हुआ ख़ुद को आज मैंने पायाअमिट है ये बंधन, ये अटूट है डोरमिट जाए दूरी, अब न हो कोई छोरपूर्णता की ओर बढ़ता ये कारवाँतू ही मेरी मंज़िल, तू ही मेरा जहाँ
अनंत का स्पंदन
विहान राग-नंदन
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