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शून्य का नाद
Duration5:08

शून्य का नाद

पंडित शून्यनाद त्रिवेदी

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा के निरंतर ड्रोन और तबले के जटिल ताल चक्र पर आधारित है। इसमें राग की सूक्ष्मता और आलाप-जोड़-झाला की पारंपरिक प्रगति के साथ आध्यात्मिक गहराई को उकेरा गया है।

Lyrics

alap

साँसों की डोरी में पिरोया है सन्नाटाशून्य के भीतर जागता है एक पुराना नातानयन मूँद कर खोजूँ मैं स्वयं की परछाईंभीतर छिपे उस अनहद की गूँज सुनाई आई

jor

समय की लकीरें बदलती हैं रंग अपनाजागती आँखों में भी पल रहा एक सपनाजैसे बूँद सागर में खोकर फिर मिल जाएवैसे ही मन की व्याकुलता तुझमें घुल जाएधड़कन की लय में बहती है एक प्यास पुरानीमिटती नहीं कभी ये रूहानी कहानी

gat

तारों के पार कोई अनकही सी पुकार हैसाँस-साँस में बिखरा तेरा ही विस्तार हैन कोई दिशा है, न कोई किनारा बचामैं तो बस तुझमें ही कहीं जाकर सिमटामौन की भाषा में पढ़ ले तू मेरी ये आरज़ूतू ही तो है आरंभ, तू ही अंत का है वज़ू

jhala

आँखें खुलीं तो देखा, सब कुछ है बस एक आभासतू ही ध्येय, तू ही मार्ग, तू ही है मेरा विश्वासमिट गई द्वैत की दीवारें, मिट गया सारा शोरशून्य में विलीन हुआ मन, पा लिया अपना छोरअब न कोई शेष, न कोई और चाहत बचीबस तू ही तू, तेरी ही रज़ा है सबसे सच्चीतेरी ही रज़ा है सबसे सच्ची

शून्य का नाद

पंडित शून्यनाद त्रिवेदी

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