तुमसे पास, तुमसे दूर
पंडित नीरव मिश्र
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा की गूंजती ड्रोन ध्वनि के साथ शुरू होती है, जो राग आधारित मेलोडिक संरचना में गहराई से उतरती है। तबला की जटिल ताल चक्र और सितार की सूक्ष्म अलंकरण युक्त जुगलबंदी एक आध्यात्मिक और शांत वातावरण का निर्माण करती है।
Lyrics
सा रे म प, ध नि साअनंत की ये मौन पुकारशून्य में बिखरा मेरा संसारन कोई दिशा, न कोई द्वारबस तेरी यादों का विस्तार
धड़कन की लय में छुपी है वो बातजो कह न सके हम, बीते दिन-रातसांसों की डोर से बुना है ये जालसमय के पहिये का ये कैसा है हाल
मन के आंगन में बरसे है नूरतुमसे ही पास, तुमसे ही दूरसा रे म प, ध नि साभीतर उपजे एक नई प्यासतुम बिन सूना हर एक एहसासरंगों के मेले में खोया है ध्यानतुम ही तो हो मेरी रूह का मान
तारों की झंकार में खोया मनभीगे हैं पल, भीगे हैं ये तनमिटती लकीरें, जुड़ते हैं भावप्रेम की नदियां, गहरे ये घावसा रे म प, ध नि सासा रे म प, ध नि साअंतहीन यात्रा, अंतहीन मौनतुम ही हो मेरे, तुम ही हो कौनसा रे म प, ध नि सा
तुमसे पास, तुमसे दूर
पंडित नीरव मिश्र
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