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शून्य की गूँज
Duration5:05

शून्य की गूँज

पंडित तारकेश व्यास

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा के निरंतर ड्रोन और तबले के जटिल ताल चक्र पर आधारित है। इसमें राग की सूक्ष्मता और आलाप-जोड़-झाला की पारंपरिक प्रगति को दर्शाया गया है, जो एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव का निर्माण करती है।

Lyrics

alap

शून्य में गूँजती है एक मौन पुकारसाँसों की डोरी में सिमटा है संसारअंधियारे नभ में ढूँढूँ मैं तेरा पतामिट जाए खुद की ही हर एक खता

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धड़कन की लय में बहती है ये सरगमपल-पल पिघलते हैं ये मेरे सब गमतारों की थरथराहट में तेरा ही नाम हैबदलता ये मौसम, बदलती ये शाम हैमैं एक मुसाफिर, तू ही मेरी मंज़िल का नूरपास होकर भी तू रहता है कोसों दूर

gat

नैनों के दर्पण में देखूँ मैं तेरा अक्समिटता जा रहा है ये मेरा सारा रक्ससमय की चक्र में उलझी है मेरी रूहतू ही है सावन, तू ही है तपती धूपसातों सुरों में पिरोई है तेरी यादेंखामोश लबों पे महकती हैं ये इबादतें

jhala

वेग में बहती है ये मेरी बेताबीमिट गई खुद की ही हर एक खराबीचक्र के घेरे में घूमती है ये कायनातदिन की तपिश में खोई है ढलती राततेरी ही धुन में डूबा है ये तन-मनतू ही है अंत, तू ही है मेरा बचपनशून्य से उपजी, शून्य में ही विलीनमैं तो हूँ बस तेरा एक साया, रंगहीन

शून्य की गूँज

पंडित तारकेश व्यास

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शून्य की गूँज by पंडित तारकेश व्यास | EchoLoRA: Generate a Song with AI