शून्य की गूँज
पंडित तारकेश व्यास
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा के निरंतर ड्रोन और तबले के जटिल ताल चक्र पर आधारित है। इसमें राग की सूक्ष्मता और आलाप-जोड़-झाला की पारंपरिक प्रगति को दर्शाया गया है, जो एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव का निर्माण करती है।
Lyrics
शून्य में गूँजती है एक मौन पुकारसाँसों की डोरी में सिमटा है संसारअंधियारे नभ में ढूँढूँ मैं तेरा पतामिट जाए खुद की ही हर एक खता
धड़कन की लय में बहती है ये सरगमपल-पल पिघलते हैं ये मेरे सब गमतारों की थरथराहट में तेरा ही नाम हैबदलता ये मौसम, बदलती ये शाम हैमैं एक मुसाफिर, तू ही मेरी मंज़िल का नूरपास होकर भी तू रहता है कोसों दूर
नैनों के दर्पण में देखूँ मैं तेरा अक्समिटता जा रहा है ये मेरा सारा रक्ससमय की चक्र में उलझी है मेरी रूहतू ही है सावन, तू ही है तपती धूपसातों सुरों में पिरोई है तेरी यादेंखामोश लबों पे महकती हैं ये इबादतें
वेग में बहती है ये मेरी बेताबीमिट गई खुद की ही हर एक खराबीचक्र के घेरे में घूमती है ये कायनातदिन की तपिश में खोई है ढलती राततेरी ही धुन में डूबा है ये तन-मनतू ही है अंत, तू ही है मेरा बचपनशून्य से उपजी, शून्य में ही विलीनमैं तो हूँ बस तेरा एक साया, रंगहीन
शून्य की गूँज
पंडित तारकेश व्यास
Preview