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शून्य का गुंजन
Duration3:25

शून्य का गुंजन

पंडित नीरव आचार्य

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा के निरंतर ड्रोन और तबले के जटिल ताल चक्र पर आधारित है। इसमें राग की सूक्ष्म स्वर-लहरियों और आलाप-जोर-झाला के शास्त्रीय ढांचे का प्रयोग किया गया है, जो श्रोता को एक गहन आध्यात्मिक अनुभव की ओर ले जाता है।

Lyrics

alap

शून्य में खोई ये सांसें,अनंत की ओर बढ़ती ये राहें।न कोई शब्द, न कोई कोलाहल,बस भीतर का मौन, और मन की हलचल।तुम ही हो आदि, तुम ही अंत,मेरे भीतर का ये अनंत।

jor

पल-पल बदलती ये स्मृतियाँ,जैसे बहती हुई शीतल नदियाँ।समय की रेत हाथों से फिसले,आंखें मूंदूँ तो सब कुछ पिघले।अस्तित्व का ये कैसा खेल,मिट्टी और रूह का अनूठा मेल।

gat

साँझ ढले तो मन घबराए,कौन दिशा से तुम आओगे?धड़कन की लय में नाम तुम्हारा,तुम ही किनारा, तुम ही सहारा।सूरज डूबा, चाँद भी खोया,रात के आँचल में सब कुछ सोया।तुम ही हो उजाला, तुम ही अँधेरा,मेरे मन में बस तेरा ही बसेरा।

jhala

वेग बढ़ा, अब होश न कोई,रूह मेरी है तुझमें ही खोई।श्वास-श्वास में स्पंदन जागे,सारे बंधन पीछे भागे।तुम ही सत्य, तुम ही आभास,मेरे भीतर श्वास-प्रश्वास।मिट गया मैं, अब तुम ही तुम हो,इस शून्य में जैसे गुंजन तुम हो।तुम ही तुम हो, तुम ही तुम हो।

शून्य का गुंजन

पंडित नीरव आचार्य

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