तुम या मेरी परछाईं
पंडित माधव शास्त्री
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा की गूंज और तबले के जटिल ताल चक्र के साथ शुरू होती है, जो राग आधारित माधुर्य में धीरे-धीरे विकसित होती है। सूक्ष्म स्वर-अलंकारों और आलाप-जोर-झाला की पारंपरिक संरचना के माध्यम से यह संगीत एक गहन आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव कराता है।
Lyrics
शून्य में खोया मन मेराबूँद सी प्यास है, सागर सा घेरासाँसों की डोरी में सिमटी है मायाअंधियारे पथ पर कोई दीप न आयाबस तुम हो, या मेरी ही परछाईंहृदय की धड़कन में तुम ही समाई
पलकें झुकीं तो दर्शन हुएबंद आँखों में नंदन खिलेसमय की धारा ठहर सी गई हैमौन की भाषा यहाँ बह रही हैन कोई बंधन, न कोई किनारातुम ही सहारा, तुम ही इशारा
निर्मल जल सी बहती धारामन का पंछी, तन का द्ववाराआने की आहट, जाने की व्याकुलतासब कुछ समर्पण, सब कुछ है विह्वलतारागों में लिपटी ये कैसी पुकार हैतुमसे ही शुरू, तुम पर ही प्यार हैमिटती लकीरें, बनते निशाँ हैंहम तो बस मिट्टी, तुम ही जहाँ हैं
बीत रही है घड़ियाँ पुरानीलिख रहे हम अपनी कहानीस्वर में छिपी है कोई अनकही बातअंबर के नीचे, हाथों में हाथचाँदनी ओढ़े ये रात जवां हैतुमसे ही रोशन ये सारा जहाँ है
तेज़ हवाओं में नाम तुम्हाराबिखरता सा हर इक किनाराधड़कन की लय में, साँसों की ताल मेंढूँढूँ तुम्हें मैं हर इक ख्याल मेंअमिट है ये बंधन, अटूट है ये नातातुमसे ही मिलता है मन को विधातापूर्ण हुआ अब ये सारा सफ़रतुम ही हो भीतर, तुम ही हो बाहर
खो गए हम, पा गए तुमकोमौन में हमने पढ़ लिया तुमकोअनंत की ओर ये दौड़ जारीतुम ही हो आख़िर, तुम ही हो प्यारीसमाप्त हुआ अब ये सारा शोरमिल गए हम, अब नहीं कोई और
तुम या मेरी परछाईं
पंडित माधव शास्त्री
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