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Duration3:28

अंतस की पुकार

पंडित मौनदीप शास्त्री

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा के निरंतर गूँजते स्वर के साथ शुरू होती है, जहाँ आलाप के माध्यम से राग की सूक्ष्मता को उभारा गया है। तबले की जटिल ताल चक्र और सितार की मद्धम झंकार रूहानी शांति का अनुभव कराती है, जो अंत में झाला के तीव्र और आध्यात्मिक लय में विलीन हो जाती है।

Lyrics

alap

सूनी है साँसें, मौन है मन की गहराईखोई है सुध-बुध, जैसे कोई ऋतु मुस्काईशून्य में उतरी, एक मद्धम सी परछाईभीतर के द्वारे, आज किसने दस्तक लगाई

jor

पल-पल बदलती, ये नब्ज़ की चाल हैसमय की धारा में, उलझा ये जाल हैसाँस जो ठहरी, तो मिला है किनाराभीतर ही ढूँढा, वो नूर का सितारा

gat

तार-तार जोड़ूँ, मैं खुद को आज फिर सेउतरे जो सुर, मेरे अंतस के दर सेलय में समाई, है ये रूह की पुकारबँध गया है मन, जैसे सावन की बहारमिट रही है दूरियाँ, घुल रही है हर एक चाहखोज में तेरी, मिल गई मुझे मेरी ही राह

jhala

दौड़ती ये धड़कन, अब ठहरने लगी हैबूँद-बूँद बरखा, अब सँवरने लगी हैमौन में जो गुँजा, वही मेरा नाम हैवही मेरा आरम्भ, वही मेरा मुकाम हैसब कुछ है अर्पण, इस पल की ओट मेंखो गया हूँ मैं, तेरी रज़ा की चोट में

अंतस की पुकार

पंडित मौनदीप शास्त्री

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