अनहद का मौन
रागिनी कौशिकी
Classical Hindustani
About
यह रचना तानपुरा की गूंज और सितार के सूक्ष्म अलंकरणों के साथ एक गहरी आध्यात्मिक यात्रा है। ताल के जटिल चक्रों और राग की शुद्धता के माध्यम से यह संगीत सुनने वाले को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
Lyrics
शून्य में गूँजती है एक मौन पुकारसाँसों की डोरी पर टिका है संसारनैनों के दर्पण में ढलती है शाममिट्टी का तन खोजे अपना मुकाम
चलती हवाओं में सुरों का बसेराबीत गया कल और आ गया सवेरापल-पल बदलती ये माया की छायामन के भँवर में ही मुक्ति को पाया
साँझ की दहलीज पर खड़ा है मनतारों की छाँव में भीगे ये तनसप्तक के घेरों में खोया किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारासाँझ की दहलीज पर खड़ा है मनतारों की छाँव में भीगे ये तनसप्तक के घेरों में खोया किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारा
लय के चक्र में घूमती ये सृष्टिअमिट है तेरी ही रची हुई दृष्टिअहंकार छूटे तो मिले वो किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारालय के चक्र में घूमती ये सृष्टिअमिट है तेरी ही रची हुई दृष्टिअहंकार छूटे तो मिले वो किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारा
अंतहीन पथ पर एक प्यास जगी हैमृगतृष्णा पीछे ही दुनिया लगी हैधैर्य की माला में मोती पिरोएरात के सन्नाटे में हम भी तो सोएमौन ही भाषा है, मौन ही सत्य हैतेरी ही रज़ा में छिपा मेरा नित्य हैसाँझ की दहलीज पर खड़ा है मनतारों की छाँव में भीगे ये तनसप्तक के घेरों में खोया किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारा
अनहद नाद में खो गया सब कुछपाया जो तुझको तो खो गया सब कुछठहरा है समय, अब न कोई सवालतू ही है आदि और तू ही विशालतू ही है आदि और तू ही विशाल
अनहद का मौन
रागिनी कौशिकी
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