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अनहद का मौन
Duration4:10

अनहद का मौन

रागिनी कौशिकी

Classical Hindustani

About

यह रचना तानपुरा की गूंज और सितार के सूक्ष्म अलंकरणों के साथ एक गहरी आध्यात्मिक यात्रा है। ताल के जटिल चक्रों और राग की शुद्धता के माध्यम से यह संगीत सुनने वाले को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।

Lyrics

alap

शून्य में गूँजती है एक मौन पुकारसाँसों की डोरी पर टिका है संसारनैनों के दर्पण में ढलती है शाममिट्टी का तन खोजे अपना मुकाम

jor

चलती हवाओं में सुरों का बसेराबीत गया कल और आ गया सवेरापल-पल बदलती ये माया की छायामन के भँवर में ही मुक्ति को पाया

gat

साँझ की दहलीज पर खड़ा है मनतारों की छाँव में भीगे ये तनसप्तक के घेरों में खोया किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारासाँझ की दहलीज पर खड़ा है मनतारों की छाँव में भीगे ये तनसप्तक के घेरों में खोया किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारा

jhala

लय के चक्र में घूमती ये सृष्टिअमिट है तेरी ही रची हुई दृष्टिअहंकार छूटे तो मिले वो किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारालय के चक्र में घूमती ये सृष्टिअमिट है तेरी ही रची हुई दृष्टिअहंकार छूटे तो मिले वो किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारा

gat

अंतहीन पथ पर एक प्यास जगी हैमृगतृष्णा पीछे ही दुनिया लगी हैधैर्य की माला में मोती पिरोएरात के सन्नाटे में हम भी तो सोएमौन ही भाषा है, मौन ही सत्य हैतेरी ही रज़ा में छिपा मेरा नित्य हैसाँझ की दहलीज पर खड़ा है मनतारों की छाँव में भीगे ये तनसप्तक के घेरों में खोया किनारातू ही तो है मेरा सबसे प्यारा

jhala

अनहद नाद में खो गया सब कुछपाया जो तुझको तो खो गया सब कुछठहरा है समय, अब न कोई सवालतू ही है आदि और तू ही विशालतू ही है आदि और तू ही विशाल

अनहद का मौन

रागिनी कौशिकी

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