शून्यता का मुकाम
पंडित नीरव जोशी
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा के निरंतर गूंजते स्वर और सितार की सूक्ष्म मींडों के साथ शुरू होती है, जो धीरे-धीरे तबले के जटिल ताल चक्र में परिवर्तित हो जाती है। इसमें राग-आधारित माधुर्य और आध्यात्मिक गहराई का अनूठा संगम है, जो श्रोता को एक गहन आत्म-चिंतन की यात्रा पर ले जाता है।
Lyrics
सांसों के इस खालीपन में, एक अनकही सी प्यास जगी है।धुंधली सी उन यादों में, कोई रूह मेरी खोई सी है।न कोई शोर, न कोई नाम, बस शून्यता का ये मुकाम।
पल-पल ढलती परछाईं, समय की रेत हाथ से फिसली।नैनों के दर्पण में देखो, तस्वीर कोई धुंधली सी निकली।अंधियारे में दीप जलाया, खुद को खुद से आज मिलाया।भीतर का ये मौन पुकारे, टूट गए सब मोह के द्वारे।
सावन की पहली बूंदें जैसे, मन की सूखी ज़मीन को छूतीं।बीते कल की सारी बातें, अब धीरे-धीरे खुद को भूलतीं।लय में बंधी ये सांसें मेरी, ढूंढें तुझमें अपनी सवेरी।चक्र ये जीवन का चलता रहे, सागर में बूंद ये मिलता रहे।
तारों की थरथराहट में, तेरा ही कोई नाम लिखा है।हर एक धड़कन की हलचल में, तू ही तो बस एक सखा है।अब न कोई दूरी बाकी, मिट गई हर एक मजबूरी बाकी।बस एक सुर, बस एक ताल, मिट गया सारा जंजाल।पूर्ण हुआ ये सफर आज, खुल गया रूह का हर एक राज।
शून्यता का मुकाम
पंडित नीरव जोशी
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