शून्य की मल्हार
पंडित मल्हारेश्वर द्विवेदी
शास्त्रीय हिंदुस्तानी
About
यह रचना तानपुरा के निरंतर गुंजन और सितार की सूक्ष्म मींडों के साथ एक गहन शास्त्रीय अनुभव प्रदान करती है। इसमें राग-आधारित माधुर्य और जटिल ताल चक्र का समावेश है, जो श्रोता को एक ध्यानपूर्ण और आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाता है।
Lyrics
शून्य में खोई ये कैसी पुकार हैसाँसों में बसी तेरी ही मल्हार हैबिन कहे जो समझ ले वो मौन तूमेरे भीतर का ही एक कौन तूधुंधली सी राहों में तेरा ही नूर हैमंज़िल भी पास है और तू ही दूर है
पलकें झुकी तो नज़ारा बदल गयावक़्त का हर एक किनारा बदल गयामृगतृष्णा सा ये संसार सारा हैफिर भी मुझे तेरा ही सहारा हैनदियों सा बहता ये मन का वेग हैतुझसे ही शुरू हर एक संयोग है
सावन की पहली बूँद सी प्यास हैतू ही तो मेरे हर अहसास में खास हैआँखों की नमी में तेरी ही सूरत हैतू ही इबादत तू ही मेरी मूरत हैनज़्मों में ढली ये रूह की जुस्तजूमैं भी यहाँ हूँ और बस तू ही तू
तार-तार बिखरा मैं खुद में सिमट जाऊँतेरे ही सुरों में मैं आज मिट जाऊँलहरों की थपकी पे थिरके ये कायनातदिन का उजाला और ढलती हुई राततू ही मेरी धुन तू ही मेरा ताल हैतुझमें ही उलझा ये जीवन का जाल हैअंतहीन सफर में बस एक ही नाम हैतू ही सुबह मेरी तू ही मेरी शाम है
शून्य की मल्हार
पंडित मल्हारेश्वर द्विवेदी
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