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साँझ का समर्पण
Duration3:18

साँझ का समर्पण

पंडित श्यामकान्त शर्मा

शास्त्रीय हिंदुस्तानी

About

यह रचना तानपुरा की गूंज और तबले के जटिल ताल चक्र के साथ शुरू होती है, जो एक गहरे आध्यात्मिक राग का ताना-बाना बुनती है। इसमें सूक्ष्म स्वर-अलंकारों का प्रयोग करते हुए गायक ने एक भावुक प्रेम-गीत को शास्त्रीय बंदिश के रूप में पिरोया है।

Lyrics

alap

साँझ ढले, मनवा मेरा भटकेअंखियों में बस गए, सांवले सलोनेजैसे कोई रीत पुरानी, मन में उतरीबिन कहे, सब कह गए...

jor

धड़कन की सरगम, तुमसे ही शुरू हैतुम ही किनारा, तुम ही तो सू-सू हैसांसों की माला में, नाम तुम्हारा पिरोयाखोया है जो कल, आज फिर से संजोयापल-पल बढ़ती, ये कैसी प्यास हैतुम पास होकर भी, क्यों दूर का आभास है?

gat

नैनों में काजरा, बन के तू छा जासुरों की महफिल में, ओ कान्हा आ जालय की गति में, मेरा मन डोलेबिन बोले सब, वेद ये खोलेचक्र समय का, घूमता जाएतू जो न हो तो, कौन ये गाये?साँझ ढले, मनवा मेरा भटकेअंखियों में बस गए, सांवले सलोने

jhala

तारों की झनकार में, तेरा ही नाम हैसुबह का सूरज, मेरा ही काम हैछिन-छिन बाजे, पायलिया मन कीराहें जो देखे, सब तेरी रैन कीआ जा, आ जा, मेरे सांवरियाआ जा, आ जा, सांवले सलोनेआ जा, आ जा, मेरे सांवरिया!

साँझ का समर्पण

पंडित श्यामकान्त शर्मा

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