सांझ की पगडंडी
धरती धानी
Indian Folk
About
यह गीत ग्रामीण भारत की सादगी और मिट्टी से जुड़े गहरे लगाव को दर्शाता है। इसमें तबला और ढोलक की जीवंत ताल के साथ सारंगी की मधुर मोडालिटी का उपयोग किया गया है, जो पारंपरिक लोक संगीत की आत्मा को जीवंत करता है।
Lyrics
ओ रे मनवा, जाग ज़रामिट्टी की खुशबू को थाम ज़रापग-पग डोलती ये धरती धानीसुन ले तू आज ये अनकही कहानी
खेतों की मेढ़ पे सूरज अटका हैपसीने की बूंदों में सावन लटका हैदादी की बातों में वो पुरानी यादेंहाथों की लकीरों में लिखी ये इबादतनदी के किनारे वो पीपल की छांवयादों का डेरा है, मेरा ये गांवहवाओं ने छेड़ी है कोई पुरानी तानमिट्टी से जुड़कर ही मिलता है मान
ओ मेरी माटी, ओ मेरे आँगनतुझमें ही बसता है मेरा ये जीवनझूम के गाए ये हवाओं की टोलीरंगों में घुली है ये खुशियों की होली
चाँदनी रात में चूड़ियों की खनकआंखों में बसी है वो मीठी सी चमकदूर कहीं बजती वो घुंघरू की तालबदले समय पर, न बदले ये चालबड़ों का आशीर्वाद, दुआओं का सायारिश्तों का ताना-बाना हमने है पायाहंसते-हंसाते ये दिन बीत जाएंगेमिट्टी के कर्ज हम यहीं चुकाएंगे
ओ मेरी माटी, ओ मेरे आँगनतुझमें ही बसता है मेरा ये जीवनझूम के गाए ये हवाओं की टोलीरंगों में घुली है ये खुशियों की होली
सांझ ढले जब पंछी घर आएंहम भी तो लौटकर घर को ही जाएंमिट्टी की खुशबू, रूह में समाएमिट्टी की खुशबू, रूह में समाए
सांझ की पगडंडी
धरती धानी
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