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Duration4:35

शून्य में खोया मन

पंडित स्मृतिविहारी

हिंदुस्तानी शास्त्रीय

About

यह रचना तानपुरा की गूंज और सितार की सूक्ष्म मींड के साथ शुरू होती है, जो राग-आधारित माधुर्य का विकास करती है। तबले की जटिल ताल चक्र और गायन की भावपूर्ण अभिव्यक्ति मिलकर एक आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण करती है, जो प्राचीन परंपराओं को जीवंत करती है।

Lyrics

alap

सूनी साँसों की डोरी, मन के कोने में उलझीजैसे भोर का तारा, धुंधली ओस में पिघलीकोई नाम नहीं, कोई पता नहींबस एक अनकही प्यास है, जो कहीं थम नहीं रहीअस्तित्व का ये सूनापन, जैसे शून्य में खोया मनमैं खुद को ढूँढता हूँ, जहाँ कोई किनारा नहीं

jor

धड़कन की लय में, एक गहरा सन्नाटा हैसमय की रेत पर, बिखरा हुआ साता हैपल-पल बीतती ये रात, जैसे कोई पुरानी बाततेरी यादों के झोंके, ले आते हैं बरसातमैं भटकता राही, तू मेरी मंज़िल का इशाराइस भंवर में फँसा, तू ही एकमात्र सहारा

gat

नैनों की खिड़की से, झाँकता है वो नूरसपनों की दुनिया से, होता हुआ चकनाचूरसातों सुरों के बीच, एक दर्द का ठिकाना हैतेरा ये आना-जाना, जैसे कोई पुराना फ़साना हैमैं गाता रहूँ, तू सुनता रहेये सिलसिला यूँ ही, उम्र भर चलता रहेमिट्टी का ये तन, पानी की एक बूंद सातेरी रज़ा में बहता, जैसे कोई रूह का खोंद सा

jhala

तीव्र इस वेग में, अब होश कहाँ बाकी हैअश्रु की बूंदों में, बसी तेरी झांकी हैमैं मिट जाऊँ, मैं बिखर जाऊँतेरी ही धुन में, मैं निखर जाऊँहवाओं में घुली, तेरी ही एक पुकार हैये जीवन बस, तेरा ही एक विस्तार हैअधूरी सी बात, पूरी सी मुलाक़ातअब तो बस तू है, और ये ढलती हुई राततेरा ही नाम, मेरा ही कामसब कुछ समर्पित, तुझे ही प्रणाम

gat

सूरज ढला, अब चाँदनी का पहरा हैमन के आंगन में, बस तेरा ही चेहरा हैनदी की लहरों सा, ये जीवन बहता जाएकौन जाने कल क्या, ये वक़्त साथ लाएमैं एक मुसाफ़िर, तू राह का उजालाइस प्यासी रूह को, तूने ही संभालासाँसों की सरगम, अब थमने को आई हैतेरे ही चरणों में, मुक्ति समाई हैसमाई है, हाँ समाई हैतेरी ही यादों में, दुनिया बसाई है

शून्य में खोया मन

पंडित स्मृतिविहारी

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