ओ रे मनवा, धरती पुकारे
आलोक और लोक धुनें
भारतीय लोक संगीत
About
यह गीत मिट्टी की महक और ग्रामीण जीवन की सादगी को समर्पित है। इसमें ढोलक की थाप, हारमोनियम की मधुर धुन और सारंगी के सूक्ष्म स्वरों का समावेश है, जो एक पारंपरिक और भावुक वातावरण तैयार करता है।
Lyrics
ओ रे मनवा, जाग ज़रामिट्टी पुकारे, भाग ज़रासावन की पहली फुहार हैधरती का ये श्रृंगार है
खेतों में लहराती सोना सी बालियाँपेड़ों पे बैठी हैं मीठी सी डालियाँपगडंडी पूछे कहाँ खो गया तू मुसाफिरगाँव की गलियों में है अब भी वो आखिरदादी की लोरी और चूल्हे का धुआँयादें पुरानी हैं, महका है पूरा कुआँ
ओ ओ, मिट्टी की सोंधी खुशबू में खो जाऊँमैं तो अपने गाँव की गलियों में सो जाऊँरिश्तों के धागे हैं, प्यार की ये डोर हैसच्ची खुशी का यही तो एक शोर है
माथे पे तिलक और हाथों में मालामंदिर की घंटी ने सबको संभालाश्रद्धा के फूल अब चरणों में अर्पणशांत है मन और पवित्र है दर्पणपतझड़ के बाद फिर बहारें आती हैंबीती हुई बातें फिर यादें लाती हैं
ओ ओ, मिट्टी की सोंधी खुशबू में खो जाऊँमैं तो अपने गाँव की गलियों में सो जाऊँरिश्तों के धागे हैं, प्यार की ये डोर हैसच्ची खुशी का यही तो एक शोर है
ओ ओ, मिट्टी की सोंधी खुशबू में खो जाऊँमैं तो अपने गाँव की गलियों में सो जाऊँरिश्तों के धागे हैं, प्यार की ये डोर हैसच्ची खुशी का यही तो एक शोर है
घर की वो दहलीज, माँ का वो आँचलजीवन का यही है असली सा संबलबस यादें हैं, बस प्यार हैये अपना ही संसार हैसंसार है, अपना संसार है।
ओ रे मनवा, धरती पुकारे
आलोक और लोक धुनें
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