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ओ रे मनवा, धरती पुकारे
Duration4:36

ओ रे मनवा, धरती पुकारे

आलोक और लोक धुनें

भारतीय लोक संगीत

About

यह गीत मिट्टी की महक और ग्रामीण जीवन की सादगी को समर्पित है। इसमें ढोलक की थाप, हारमोनियम की मधुर धुन और सारंगी के सूक्ष्म स्वरों का समावेश है, जो एक पारंपरिक और भावुक वातावरण तैयार करता है।

Lyrics

intro

ओ रे मनवा, जाग ज़रामिट्टी पुकारे, भाग ज़रासावन की पहली फुहार हैधरती का ये श्रृंगार है

verse

खेतों में लहराती सोना सी बालियाँपेड़ों पे बैठी हैं मीठी सी डालियाँपगडंडी पूछे कहाँ खो गया तू मुसाफिरगाँव की गलियों में है अब भी वो आखिरदादी की लोरी और चूल्हे का धुआँयादें पुरानी हैं, महका है पूरा कुआँ

refrain

ओ ओ, मिट्टी की सोंधी खुशबू में खो जाऊँमैं तो अपने गाँव की गलियों में सो जाऊँरिश्तों के धागे हैं, प्यार की ये डोर हैसच्ची खुशी का यही तो एक शोर है

verse

माथे पे तिलक और हाथों में मालामंदिर की घंटी ने सबको संभालाश्रद्धा के फूल अब चरणों में अर्पणशांत है मन और पवित्र है दर्पणपतझड़ के बाद फिर बहारें आती हैंबीती हुई बातें फिर यादें लाती हैं

refrain

ओ ओ, मिट्टी की सोंधी खुशबू में खो जाऊँमैं तो अपने गाँव की गलियों में सो जाऊँरिश्तों के धागे हैं, प्यार की ये डोर हैसच्ची खुशी का यही तो एक शोर है

instrumental-break
refrain

ओ ओ, मिट्टी की सोंधी खुशबू में खो जाऊँमैं तो अपने गाँव की गलियों में सो जाऊँरिश्तों के धागे हैं, प्यार की ये डोर हैसच्ची खुशी का यही तो एक शोर है

outro

घर की वो दहलीज, माँ का वो आँचलजीवन का यही है असली सा संबलबस यादें हैं, बस प्यार हैये अपना ही संसार हैसंसार है, अपना संसार है।

ओ रे मनवा, धरती पुकारे

आलोक और लोक धुनें

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