शून्य में विलीन
पंडित समाधानंद
भजन
About
यह रचना राग-आधारित शास्त्रीय संगीत और भक्ति भाव का एक अनूठा संगम है। इसमें हारमोनियम और तबले की जीवंत ध्वनि के साथ एक शांत और ध्यानमग्न करने वाली गायकी का प्रयोग किया गया है, जो श्रोता को आंतरिक शांति की ओर ले जाती है।
Lyrics
मन की गलियों में सन्नाटा पसरा हैदीपक की लौ में कोई सपना बिखरा हैशून्य की ओर बढ़ते हैं कदम मेरेतुझमें ही खो जाने का इरादा है
भीड़ में खोया था मैं खुद से ही दूरअहंकार की चादर में था मैं चूर-चूरअब न कोई बंधन, न कोई सवाल हैतेरी ही रज़ा में मेरा हर एक हाल हैमिट रही है ये रेखा मैं और तू कीअब बस बहती प्रेम की एक धार है
- ओ मेरे साजन
- तुझमें ही जीवन
- मिट जाए दूरी
- हो जाए पूरी
- तू ही किनारा
- तू ही सहारा
सांसों की माला पे नाम तेरा पिरोया हैइस आत्मा ने खुद को तुझमें ही बोया हैजड़ से चेतन तक तेरी ही छाया हैतूने ही मुझको मुझमें वापस बुलाया हैहर कण में गूंजता एक ही सुर हैतू ही तो सत्य है, तू ही नूर है
शांत है मन, शांत है ये धरातुझमें ही समाया है ये जहान साराबस तू ही तू...बस तू ही तू...अनंत में विलीन हो रहा ये वजूदसब कुछ पा लिया, अब न कुछ है अधूराशांति... बस शांति...
शून्य में विलीन
पंडित समाधानंद
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