लय का विसर्जन
रागिनी मयंक
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत
About
यह रचना तानपुरा की गूंज और सूक्ष्म राग-आधारित विकास के साथ शुरू होती है, जो धीरे-धीरे एक जटिल ताल चक्र में परिवर्तित होती है। इसमें शास्त्रीय गायन की बारीकियों और मींड का उपयोग करते हुए आध्यात्मिक गहराई को दर्शाया गया है, जो श्रोता को एक ध्यानपूर्ण अवस्था में ले जाता है।
Lyrics
शून्य की गोद में, मौन का विस्तार हैसाँस की डोर पर, रूह का आधार हैआदि से अंत तक, एक ही पुकार हैभीतर के अँधियारे में, ज्योति का संचार है
पलकें झुकीं तो, राहें सिमट गईंखोजती नज़रों में, यादें लिपट गईंसमय की धारा में, पल ये ठहर गएजो कभी थे नहीं, वो भी संवर गएसूक्ष्म सी लय में, धड़कनें बह रही हैंमौन की भाषा में, रूहें कह रही हैं
तार-तार झनझनाए, मन का ये कोना-कोनाखोया हुआ सा फिर, खुद को ही खोनाउड़ती सी धूल में, अम्बर का साया हैजो न था कभी, वो ही तो पाया हैचक्र घूमता है, काल के घेरे मेंउजाला ढूँढते हैं, हम सब अंधेरे मेंतीव्र गति से, ये जीवन दौड़ता हैमौन का बंधन, पल-पल तोड़ता है
नयन बंद कर, देख ले नज़ाराभीतर ही फैला, ये जग साराजो बीत गया, वो तो सपना थाजो साथ है अब, वही तो अपना थास्थिर हो जा, इस वेग के बीच मेंछिप जा कहीं, तू ही तू के बीच मेंसाँस का आना, एक अर्जी हैसाँस का जाना, उसकी मर्जी हैअधरों पर मुस्कान, और आँखों में नमीपूरी हो रही है, आज हर एक कमीलय के इस खेल में, हम सब मोहरे हैंकल भी हम थे, आज भी गहरे हैंमुक्ति का मार्ग, इस राग में छिपा हैजिसने इसे पाया, वही तो खुदा हैसाँस का आना, एक अर्जी हैसाँस का जाना, उसकी मर्जी है
लय का विसर्जन
रागिनी मयंक
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