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Duration3:52

रूह का शून्य बसंत

विहान कौशल्या

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत

About

यह रचना तानपुरा के निरंतर ड्रोन और सितार की सूक्ष्म मींड के साथ रगात्मक विकास को दर्शाती है। इसमें ताल चक्र की जटिलता और आध्यात्मिक गहराई का अनूठा संगम है, जो श्रोता को एक गहन ध्यानपूर्ण अवस्था में ले जाता है।

Lyrics

alap

साँसों की डोरी में पिरोई ये कैसी प्यास हैशून्य के सन्नाटे में बस तेरी ही तलाश हैनैनों के दर्पण में धुंधला सा इक नूर हैतू पास होकर भी मुझसे कितना दूर हैअगम-अगोचर, तू ही आदि, तू ही अंत हैमेरी रूह का तू ही तो बसंत है

jor

पल-पल ढलती ये रैन, मन में बेचैनी का डेरा हैअंधियारे पथ पर बस तेरा ही सवेरा हैभीतर के द्वारों को खोलूँ तो क्या पाऊंकिस नाम से पुकारूँ, किस ओर मैं जाऊंपतझड़ सी यादें, सावन की बौछारेंतेरी ही राह तके, ये नयन बेचारे

gat

मन के मंजीरे बज उठे, जब तेरा ध्यान आयाभटकती हुई रूह को, अपना ठिकाना मिल गयाताल की लय में सिमट गया, ये जग सारातू ही किनारा, तू ही बहती हुई धाराखोया हुआ था मैं, खुद की ही तलाश मेंअब तू ही तू है, मेरी हर एक साँस मेंबजती है धड़कन, जैसे कोई पुकार होतू ही इबादत, तू ही मेरा संसार हो

jhala

अग्नि सी तपती ये लगन, अब न बुझेगीतेरी ही धुन में ये रूह, अब न थमेगीआँखों की नदियाँ, सागर में मिल गईंबिखरी हुई कलियाँ, गुलशन में खिल गईंअमिट है ये नाता, अटूट ये डोर हैतेरी ही मस्ती में, मन सराबोर हैमिट गया फासला, मिट गई ये दूरीतू ही तो है मेरी, हर एक ख्वाहिश पूरीअमिट है ये नाता, अटूट ये डोर हैतेरी ही मस्ती में, मन सराबोर है

gat

साँसों की माला पे, तेरा ही नाम हैतू ही इबादत, तू ही मेरा काम हैलय में पिरोया, खुद को मैंने आज हैतेरी ही बन्दगी में, मेरा सारा राज हैअब न कोई उलझन, न कोई सवाल हैतेरी रजा में ही, मेरा ये हाल हैतू ही किनारा, तू ही बहती हुई धारातू ही तो है मेरा, सहारा और प्याराबस तू ही तू है, मेरी हर एक साँस मेंखो गया मैं अब, तेरी ही तलाश में

रूह का शून्य बसंत

विहान कौशल्या

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