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Duration3:41

सांसों का समर्पण

विहान कौल

हिंदुस्तानी शास्त्रीय

About

यह रचना तानपुरा की गूंज और सितार के सूक्ष्म मींड के साथ शुरू होती है, जो धीरे-धीरे राग-आधारित माधुर्य में विकसित होती है। इसमें तबले के ताल चक्र के साथ एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव पिरोया गया है, जो श्रोता को आत्म-साक्षात्कार की यात्रा पर ले जाता है।

Lyrics

alap

सांसों के इस खालीपन में, ढूंढूं तुझको हर कण में।न कोई राह, न कोई किनारा,बस तेरा ही है एक सहारा।मौन है मन, शून्य है नयन,खोया हुआ है मेरा ये जीवन।

jor

धड़कन की लय में नाम तेरा,जैसे भोर का हो सवेरा।धीरे-धीरे बढ़ती प्यास,सांसों में तेरी ही है बास।जितना पास आऊं, उतना दूर तू,मेरे ही अंदर का नूर तू।बुनता रहूं मैं यादों के धागे,सोए हुए अरमान अब जागे।

gat

तरसती निगाहें, राहें निहारे,कब आओगे तुम, ओ मेरे प्यारे।पल-पल बीते, युग सा लागे,मन के अंधेरे अब तो त्यागे।आओ न अब, देर न करना,सागर में है बूंद का मरना।आओ न अब, देर न करना,सागर में है बूंद का मरना।

jhala

तेज हुई है अब ये पुकार,जैसे बहे कोई बेग़म धार।तू ही आदि, तू ही अंत,मिटा दे मन का सारा द्वंद्व।तेरा ही साया, तेरा ही रंग,जी लूं मैं अब तेरे ही संग।तू ही आदि, तू ही अंत,मिटा दे मन का सारा द्वंद्व।अब तो मिल जा, अब तो मिल जा,मुझमें ही तू, मुझमें ही खिल जा।अब तो मिल जा, अब तो मिल जा।

सांसों का समर्पण

विहान कौल

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