मन की वीणा
आलोक शास्त्री
भजन
About
यह भजन एक पारंपरिक हारमोनियम धुन और तबले के लयबद्ध चक्र पर आधारित है। इसमें एक गहन आध्यात्मिक आह्वान और प्रत्युत्तर (call-and-response) संरचना है जो धीरे-धीरे भक्ति की तीव्रता को बढ़ाती है।
Lyrics
मन की वीणा के तार छेड़ देशून्य में मुझको तू मोड़ देसाँसों की डोरी सौंप दी तुझकोअस्तित्व मेरा अब छोड़ दे
खोजता रहा मैं बाहर जिनकोवो तो घट-घट में वास करते हैंपत्थरों की मूरत में भी देखोकैसे वो अपनी प्यास भरते हैंभटकती रूह को किनारा मिल गयातेरी शरण का सहारा मिल गया
हे प्रभु तू ही आधार हैतेरा ही नाम संसार हैजहाँ देखो वहाँ तू ही तू हैमेरे मन का तू ही प्यार है
अहंकार की दीवारें ढह गईंआँखों से अब पर्दा हट गयाजो उलझनें थीं कल तक ज़िन्दगी मेंउनका हर एक धागा कट गयातेरी ज्योति से रोशन ये राह हैतू ही मेरी अब पनाह है
जय श्री कृष्ण, जय श्री कृष्ण
मन में बसा है, प्रभु का नाम
जय श्री कृष्ण, जय श्री कृष्ण
मिलता है हर पल, यहाँ विश्राम
जय श्री कृष्ण, जय श्री कृष्ण
तू ही है दाता, तू ही है शाम
न मुझे स्वर्ग की कोई चाह हैन मोक्ष की कोई अभिलाषा हैबस तेरी भक्ति का रंग चढ़ेयही जीवन की परिभाषा हैतू ही है मंज़िल, तू ही है रास्तातू ही है मेरे दिल का वास्ता
तेरा नाम पुकारूँ, बार-बार पुकारूँतेरी राहों में अपना, सब कुछ मैं वारूँउठती है लहरें, भक्ति की धारातू ही है स्वामी, तू ही सहाराजय हो, जय हो, जय हो तेरीमिट जाए ये हस्ती, बस रहे तू ही
तू ही है रचयिता, तू ही है पालनहारतू ही है अंत और तू ही विस्तारमुझमें तू, तुझमें मैं, मिट गया फासलातू ही है आदि और तू ही है फैसला
हरि बोल, हरि बोल
प्रेम की वाणी, तू ही तो बोल
हरि बोल, हरि बोल
भक्ति के सागर, में जा तू डोल
हरि बोल, हरि बोल
जीवन की गांठें, दे तू खोल
अमिट है ये नाता, अटल है ये विश्वासहर एक धड़कन में, तेरा ही है वासतेरी शरण में, सब कुछ अर्पणपवित्र हो जाए, ये तन और मन
शांत हुआ मन, शांत हुई धारामिल गया अंत में, प्रभु का सहारातू ही है शेष, तू ही है आदितू ही है स्वामी, तू ही है समाधितू ही है समाधि...तू ही है समाधि...
मन की वीणा
आलोक शास्त्री
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