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Duration5:16

शून्य का सवेरा

पंडित आरव शास्त्री

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत

About

यह रचना तानपुरा के निरंतर ड्रोन और सितार की सूक्ष्म मींड के साथ शुरू होती है, जो आलाप-जोड़-झाला के पारंपरिक ढांचे का पालन करती है। तबले की जटिल ताल चक्र और भावपूर्ण गायकी मिलकर एक आध्यात्मिक और शांत वातावरण का निर्माण करते हैं।

Lyrics

alap

सांसों के इस खाली आंगन में, शून्य का बसेरा हैभीतर की गहराई में, एक धुंधला सा सवेरा हैन कोई दिशा, न कोई छोर, बस एक अनंत पुकारजैसे बूंदें सिमट रही हों, सागर के उस पार

jor

मन की लहरें अब बढ़ने लगी हैं, एक लय में बंधने कोअधूरी सी कुछ बातें हैं, जो दिल में ही रहने कोसमय का पहिया रुक सा गया है, इस मौन की छाया मेंढूंढ रहा हूँ खुद को अब, अपनी ही काया में

gat

तेरी यादों के धागे, मेरी धड़कन से उलझे हैंजैसे सावन के बादल, पर्वत से आके सुलझे हैंनयन मेरे अब पथ निहारें, कब ये मिलन की रात ढलेबिन तेरे ये जीवन मेरा, जैसे बिन जल के फूल खिलेतेरी यादों के धागे, मेरी धड़कन से उलझे हैंजैसे सावन के बादल, पर्वत से आके सुलझे हैं

jhala

तारों की झनकार में, अब नाम तेरा ही गूंजे हैपग-पग पर ये मन मेरा, बस तेरी ही ओर मुड़े हैतू ही आदि, तू ही अंत, तू ही मेरी प्यास हैइस सांस की हर एक आहट, तेरे ही पास हैतेरी ही पास है, तेरी ही पास हैसब कुछ तुझमें ही सिमट गया, तू ही विश्वास हैतू ही विश्वास है, तू ही विश्वास है

gat

तेरी यादों के धागे, मेरी धड़कन से उलझे हैंजैसे सावन के बादल, पर्वत से आके सुलझे हैंनयन मेरे अब पथ निहारें, कब ये मिलन की रात ढलेबिन तेरे ये जीवन मेरा, जैसे बिन जल के फूल खिलेजैसे बिन जल के फूल खिलेजैसे बिन जल के फूल खिले

शून्य का सवेरा

पंडित आरव शास्त्री

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शून्य का सवेरा by पंडित आरव शास्त्री | EchoLoRA: Generate a Song with AI