Skip to content
शून्य की पुकार
Duration5:16

शून्य की पुकार

पंडित शून्यनाद वीणावादक

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत

About

यह रचना तानपुरा के निरंतर गुंजन के साथ शुरू होती है, जो राग-आधारित मेलोडिक विकास और जटिल ताल चक्र के माध्यम से एक आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाती है। इसमें सूक्ष्म श्रुतियों और मींड का प्रयोग करते हुए अलाप, जोड़, झाला और गत के पारंपरिक ढांचे को अपनाया गया है।

Lyrics

alap

शून्य में लीन, एक अनकही पुकारसाँसों की डोर, जैसे मौन का विस्तारनभ के कोने से उतरी, एक धुंधली सी यादसमय की लकीरों में, खोया है मेरा संसार

jor

धड़कन की लय में, उतरता चला गयामैं खुद से ही मिलकर, बिखरता चला गयान कोई किनारा, न कोई मंज़िल का पताबस एक नाम तेरा, रूह में निखरता चला गयापलकों के नीचे, ठहरी है एक प्यास पुरानीअधूरी सी कोई, रूहानी कहानी

jhala

तारों की झंकार से, गूंजता है अंतसभीतर की अग्नि में, पिघल रहा है मानसतेज़ है ये धारा, बह रही है मुझमेंसब कुछ मिटाकर, बस तू ही है मुझमेंपल-पल का कंपन, जैसे कोई वरदानतू ही मेरी मुक्ति, तू ही मेरा जहान

gat

साँझ की दहलीज पर, दीप जलने लगेअंधियारे रास्तों पर, पग चलने लगेआँखों की नमी में, नदियाँ बहती रहींहोठों की खामोशी, सब कुछ कहती रहींअनंत के सागर में, मैं एक बूँद ठहरातेरी ही छाया में, अब तो मैं निखरामिट गई दूरी, मिट गया हर एक निशानमुझमें ही बसता है, सारा का सारा आसमानतू ही आरंभ, तू ही मेरा अवसानतू ही मेरी धुन, तू ही मेरी पहचान

शून्य की पुकार

पंडित शून्यनाद वीणावादक

Preview

शून्य की पुकार by पंडित शून्यनाद वीणावादक | EchoLoRA: Generate a Song with AI